नागवल्ली का मित्रताधर्म
राघवेन्द्र कुमार राघव– नागवल्ली का मन आज रासरङ्ग में नहीं लग रहा था। रह-रह कर उसे पङ्खुड़ी की याद आ रही थी। वह याद कर रही थी कि बाल्यकाल से तरुण होने कभी भी हम […]
राघवेन्द्र कुमार राघव– नागवल्ली का मन आज रासरङ्ग में नहीं लग रहा था। रह-रह कर उसे पङ्खुड़ी की याद आ रही थी। वह याद कर रही थी कि बाल्यकाल से तरुण होने कभी भी हम […]
Friendship, Oh! friendship, a treasure so rare.More precious than anything, beyond compare. A bond so strong, a relationship so true.A treasure cherished, shining through. Friends stand together, through joy and strife.Devoted hearts, a lifelong bond […]
Dr. Raghavendra Kumar Raghav– On our motherland, friendship is a sacred creed.Friendship is more precious than every need.It is the greatest relationship that is pure and true.A treasure cherished, forever shining through.With devotion complete, every […]
तेजपुर वैसे तो बहुत अच्छी जगह है। सूरज देवता भारतवर्ष के इसी क्षेत्र से सबसे पहले अपनी यात्रा शुरू करते हैं। सुबह उठकर हिमालय की तरफ देखिए तो सफेद चांदी दूर-दूर तक बिखरी नजर आती […]
Raghavendra Kumar Tripathi Raghav : In this fast-paced and ever-changing world, we often find ourselves surrounded by a multitude of acquaintances and digital connections. However, amidst this sea of faces, one gem stands out—the true […]
मित्रता पाने की नहीं करने की चीज है।प्रेम तो मैत्री से भी ऊंचा है।प्रेम बाहर से नहीं मिलेगा।प्रेम तो प्रत्येक को अपने भीतर जगाना होता है वह भी अपने से अधिक श्रेष्ठ व्यक्ति के प्रति।निकृष्टों […]
मेरा नाम दिशा है, मैं नौवीं कक्षा में पढ़ती हूं। मेरी एक सहेली थी जिसका नाम पायल था। जो मेरे साथ पहली से आठवीं तक पढ़ती थी। अब मैं नौवीं कक्षा में प्रवेश कर चुकी […]
तांबरम (चेन्नई) ट्रेनिंग सेंटर में हमारे एक ‘मित्र’ थे।नाम था—– खैर छोड़िए, शेक्सपियर कह गए हैं कि नाम में क्या रखा है? इसलिए चलो काम की बात करते हैं। काम की बात यह कि हमारे […]
आदित्य त्रिपाठी- फूल बनकर खिलो एक कमल की तरह। कर दो शीतल सभी को विधु की तरह। आरजू है हमारी मेरे भाइयों। जब मिलो तो मिलो दोस्तों की तरह॥ था अभी पंक मे एक पंकज खिला। पंक बोला कि इससे हमे […]
★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय प्रत्येक युग में समाज विभाजित रहा है; क्योंकि वह कर्म के धरातल पर संकुचित और क्षुद्र स्वार्थ-साधना करता आया है और उस कुत्सित सिद्धि के लिए स्वानुकूल नियम की रचना […]