★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
प्रत्येक युग में समाज विभाजित रहा है; क्योंकि वह कर्म के धरातल पर संकुचित और क्षुद्र स्वार्थ-साधना करता आया है और उस कुत्सित सिद्धि के लिए स्वानुकूल नियम की रचना भी। हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिस समाज की प्रथम इकाई ‘व्यक्ति’/’मनुष्य’ को माना गया है, उसी ने अपने-अपने समाज-दर्पण अपने अनुकूल बनाये हैं, जिसमें वह अपने मुखड़े को देखकर कृत्रिम सुख को भोगने का प्रयास करता रहता है; वह समाज के समग्र आचरण के उभरते बिम्ब पर दृष्टिपात करने का साहस जुटा नहीं पाता अथवा उस पक्ष से स्वयं को पृथक् कर, मनोनुकूल स्वार्थ की आराधना करता रहता है। यही कारण है कि आज प्रत्येक प्रकार के सम्बन्ध की संवेदना इतनी घायल हो चुकी है कि ‘आत्मीय’ प्रसंग और संदर्भ ‘रक्तरंजित-से’ प्रतीत होते हैं और वे चिन्तन से परे के विषय हो चुके हैं।
‘मित्र’ शब्द को अत्यन्त ‘सहज’ और ‘संकुचित’ मान लिया गया है, जबकि जीवन का ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है, जिसमें ‘मित्र’ की गुणधर्मिता सन्निहित न हो। यह पृथक् विषय है कि किसके दृष्टिकोण और दृष्टिबोध का स्तर किस कोटि का है। जहाँ तक मैं स्वयं को टटोलता हूँ और आत्ममूल्यांकन करता हूँ तो पाता हूँ, मुझसे मित्रता बहुत समय तक निभ नहीं पाती है; लोग निभा भी नहीं पाते; क्योंकि मैं अपनी ‘कथनी-करनी’ में अन्तर नहीं कर पाता हूँ और जो ‘अन्तर’ करके जीते हैं, उनसे हाथ छुड़ाकर ‘एकाकी’ पथिक बन जाता हूँ। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में उसका एक मूल्यबोध होना चाहिए, अन्यथा वह विद्रूपता के गह्वर से स्वयं की रक्षा कर ही नहीं सकता। इतना खो चुका हूँ और पा भी चुका हूँ कि अब किसी भी मोड़ से गुज़रता हूँ तो अजनबी निगाहों से तलाशी लेते हुए, बढ़ जाता हूँ; ऐसा इसलिए भी कि वाहन का चालक स्वयं होता हूँ और ‘अवरोधनियन्त्रक’ (ब्रेक) से पाँव हटा रहता है। दुर्घटनाएँ इतनी हुई हैं कि ‘सोच’ को अलग कर लेता हूँ।
निभृत (एकान्त) जीवन जीने का अपना एक अलग ही सुख मिलता है। इस जीवन-यात्रा की रेलगाड़ी में भिन्न-भिन्न मनोवृत्ति के लोग सहयात्री रहे हैं :– कुछ ज़ंजीर खींचकर चुपके से निकल भागे; कुछ मेरी पलकों के बोझिल होने की प्रतीक्षा सहते रहे और अनुकूल क्षण पाते ही किधर-से-किधर हो गये, जान नहीं पाया; जानने की कोशिश भी नहीं की; कुछ साथ में खाये-पिये और आँखों में धूल झोंककर ऐसे ग़ायब हुए, मानो वे कभी आये ही न हों; कुछ ने लम्बे अन्तराल-बाद पुन: मिलने की कोशिशें कीं, किन्तु मेरी आँखें उपालम्भ और विक्षोभ की मुद्राओं में दिखीं; अतीत चलचित्र-सदृश घूमने लगा; अन्तत:, आँखों ने मुँह फेर लिये। वहीं उनमें से एक बड़ी संख्या उनकी रही है, जो प्राय: दिखते रहते हैं; समीप भी रहते हैं; किन्तु उनका ‘विषाक्त’ ‘दर्शन’ मिलता रहता है और ‘ढाई तोला’ रक्त’ समिधा बन जाता है। उनमें से ऐसे भी लोग हैं, जो दशकों तक साथ-साथ यात्रा करते रहने के बाद भी मेरी आँखों में धूलि झोंककर न जाने किस-किस ‘स्टेशन’ पर उतर गये। मेरा भी दोष रहा; विवेक पर ‘भावना’ का पहरा जो बैठा रखा था; भावना ने चतुराई का आश्रय लिया और ऐसी लोरी सुनायी कि विवेक सुषुुप्त हो गया; भावना स्वार्थ सिद्ध कर ऐसी खिसकी कि न ‘पश्चात्ताप’ के लिए अवकाश रहा और न ही ‘प्रायश्चित्त’ के लिए अन्तराल बचा।
मैं सदा हवा के प्रतिकूल चलता आया हूँ; क्योंकि हवा अब कुँआरी नहीं रही है; वह तो आवश्यकता से अधिक ‘प्रगल्भा’ है और अवसरजीवी भी। मैं ऐसी संदूषित हवा के पक्ष में किसी भी स्तर पर ‘आदर्श’ को नहीं ढोता। इसमें कोई दो मत नहीं, मेरे आचरण की सभ्यता ‘अनन्य’ है; किन्तु ‘निरापद’ है। मैं अपने इन्हीं दुर्गुणों के कारण आज तक किसी भी सम्बन्ध को जी नहीं पाया; विश्वास है, जी भी नहीं पाऊँगा।
आप स्वयं को टटोलें। मैं नहीं समझता कि आप मेरे-जैसे ‘दुर्गुणी’ होंगे। हाँ, यदि मेरे-जैसे ‘दुर्गुण’ हों तो ‘हाथ’ मिलाइए, अन्यथा हाथ को संकोची ही बनाये रखिए। यह संसार है और ‘हाथ’ थामनेवालों की यहाँ एक दीर्घ परम्परा और पंक्ति रही है; मन-बुद्धि आपका पथप्रदर्शन करती है, यदि स्वस्थ धारा के साथ सम्पृक्त हो तो।
कोई और कैसी भी परिस्थिति रहे, जिजीविषा और जिगीषा मेरा ‘पाथेय’ है। मैं स्वयं में ‘मैं’ हूँ और ‘हम’ भी। जिस दिन और जिस क्षण ‘परमुखापेक्षिता’ की स्थिति अथवा परिस्थिति मुझसे टकरायी, वह दिन और क्षण मेरे लिए ‘समाधि’ (जीवन से विरक्ति) का अवसर बनेगा, जो मेरे लिए ‘महत् गौरव’ का विषय होगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ सितम्बर, २०२१ ईसवी।)