नास्ति सत्य समं तपः

नास्ति विद्या समं चक्षु नास्ति सत्य समं तपः। नास्ति राग समं दुःखं नास्ति त्याग समं सुखम्॥

विद्या के समान कोई दृष्टि नहीं है। सत्य से बढ़कर कोई तप नहीं है। राग या आसक्ति से बड़ा कोई दुःख नहीं है और त्याग से बड़ा कोई भी सुख नहीं है।

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥

देवों, ब्राह्मण, गुरुजन-ज्ञानीजन का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा; यह शरीर का तप कहलाता है

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥

मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन, आत्मचिन्तन, मनोनिग्रह, भावों की शुद्धि; यह मन का तप कहलाता है।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङमयं तप उच्यते॥

उद्वेग को जन्म न देनेवाले, यथार्थ, प्रिय और हितकारक वचन बोलना, शास्त्रों का स्वाध्याय और अभ्यास करना, यह वाङ्मयी तप है।