— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
अब देश में जिस तरह की राजनीतिक प्रवृत्तियों का उदय हो रहा है, उससे ‘लोकतन्त्र’ की अस्तित्व और अस्मिता संकट में दिख रही है। ऐसे में, ‘निर्वाचन आयोग’, ‘राष्ट्रपति’, ‘उच्चतम न्यायालय’ तथा ‘उच्च विधि-परामर्शदाता-मण्डल’ को एक साथ आते हुए, संवैधानिक पहलुओं पर दृष्टि निक्षेपित करनी होगी, अन्यथा वह समय दूर नहीं, जब देश की राजनीति की प्रयोगशाला इतनी बदबूदार हो जायेगी, जितनी ‘बजबजाते नाले’ की दुर्गन्ध’ होती है।
मेरी दृष्टि में अब क्रान्तिकारी पग का उठना अपरिहार्य हो चुका है। ऐसा अनुशासन करना होगा, जिसके अन्तर्गत निम्नांकित व्यवस्था रहेगी :—
१- यदि कोई सांसद और विधायक अपने दल को छोड़कर किसी अन्य दल के साथ सम्बद्ध होता है तो उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से निरस्त कर, उसे कोई भी चुनाव लड़ने अथवा किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि में सम्मिलित होने से वंचित रखा जायेगा।
२- कोई भी दल चुनाव से पहले अथवा बाद में किसी भी दल के साथ ‘गठजोड़’ नहीं करेगा। कोई भी अपराधी, दीवालिया, विक्षिप्त, सनकी, लम्पट व्यक्ति किसी भी दल अथवा निर्दल के रूप में राजनीतिक भागीदारी नहीं कर सकेगा।
३- किसी भी प्रत्याशी की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता ‘स्नातक’ की होगी।
४- किसी भी प्रत्याशी की न्यूनतम अवस्था २५ और अधिकतम ६० वर्ष तक की रहेगी।
५- राष्ट्रपति-पद के लिए मात्र विधि-क्षेत्र का व्यक्ति प्रत्याशी होगा, जिसका निर्वाचन ‘सर्वसम्मति’ से किया जायेगा।
६- उपराष्ट्रपति और राज्यपाल का पद समाप्त किया जायेगा।
७- किसी भी सदन में कोई भी सदस्य असंसदीय कार्य करता है तो उसकी सदस्यता सदैव के लिए निरस्त कर दी जायेगी और उसका राजनीतिक भविष्य भी समाप्त कर दिया जायेगा।
८- कोई भी राजनीतिक दल यदि किसी अन्य राजनीतिक दल में फूट डालकर अथवा प्रलोभन आदिक के बल पर विधायक अथवा सांसद को अपने दल के पक्ष में करने के लिए प्रयत्नशील होता है, उस दल की वैधानिकता समाप्त कर, उसे ‘काली सूची’ में डालकर उसके पदाधिकारियों को राजनीति से वंचित रखा जायेगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ अगस्त, २०२० ईसवी।)