● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
हम-आप अपनो ‘के’ संग (लगाव) और अपनो से ‘निस्संग’ (अलगाव) के भाव को शब्दों के माध्यम से प्रकट तो कर लेते हैं; परन्तु यह शिशु (टिकोरा) उपर्युक्त दोनो भावों को अपनी बोली तथा हमारे लिए संकेत-माध्यम से प्रकट करता है।
जब अमराई झूम-झूम उठती है तब लगता है, मानो आम्र-परिवार की नारियाँ सोहर’ का गायन करती हुईं, अपने शिशु का जन्मोत्सव मना रही हों। डालियों का आरोह-अवरोह दृष्टिपथ को एक ऐसे सांस्कृतिक आयाम से सम्पृक्त करता है, जहाँ ‘कथक’ और ‘भरतनाट्यम्’ की भाव-भंगिमा जाग्रत् होने लगती हैं; वहीं ‘कथकलि’ और ‘मोहिनीअट्टम्’ की थिरकन के साथ हमारी आँखें सुरमयी दृश्य की साक्षी बनने लगती हैं। पात का निपात मातृत्व का दर्शन कराता अनुभव होता है, मानो सद्य:प्रसूता आत्मविह्वल होकर, अनिर्वचनीय मातृसुख-उपभोग करते हुए, अपने शिशु को थपकी देकर सुला रही हो; डालियाँ जब मदमस्त अन्दाज़ मे झूमने लगती हैं; गाहे-बगाहे मंजरी की आड़ से जब टिकोरा अँगड़ाई लेता है और करवटें बदलने लगता है ‘तब टिकोड़ा-दर्शन’ होता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो मातृत्व की छाँव मे टिकोड़े आत्यन्तिक सुख को जी और भोग रहे हों।
इसी विषय का एक अन्य पक्ष है, जो चिरन्तन/शाश्वत्/स्थायी सत्य है; और वह यह कि डाली के साथ जुड़ा टिकोरा जब उससे पृथक् होता है तब वह कान्तिहीन हो जाता है तथा परिवार-रहित होकर क्लान्त और म्लान तन-मन का हो जाता है; उसका नैसर्गिक सौन्दर्य विवर्ण होने लगता है। शनै:-शनै: आत्मीय पार्थक्य की वेदना उसे संघातिक अवस्था मे लेती चली जाती है।
हम यदि दोनो अवस्थाओं, दशाओं, स्थितियों/स्थितिओं का मानवीकरण करके परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए मूल्यांकन करते हैं तो निष्पत्ति प्राप्त होती है कि जीवन-मरण संग-साथ चलते और रहते हैं; चलते-चलते, कोई श्रान्त होकर ठहर जाता है तो कोई आगे निकल आता है।
यही है, सृष्टि का काल-चक्र, जो गतिमान है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ७ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)