स्मृति-वातायन ०——–
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
डॉ० अब्दुल कलाम प्रेय थे तो श्रेय भी। उन्होंने जब राष्ट्रपति-पद की शपथ ली थी तब अपने ओजस्वी सम्बोधन में जो कुछ कहा था, उससे ही प्रतीत हो गया था कि यथार्थ की कठोर भूमि पर खड़ा वह प्रौद्योगोकीविद् अब ‘स्वप्नद्रष्टा’ राष्ट्रनायक की भूमिका का निर्वहण करने के लिए पग उठा चुका था। उसे प्रतीक्षा थी, अपने एक अरब से अधिक देशवासियों के एक ऐसे अभियान की, जनान्दोलन की, जिनके परिणाम-प्रभाव से भारत कुपोषणता, निर्धनता, अशिक्षा तथा बेरोज़गारी से मुक्त हो सके; आर्थिक-सामाजिक-सामरिक रूप में समृद्ध और आत्मनिर्भर बन सके।
तीव्र गति में बदलती परिस्थितियों में डॉ० कलाम ने प्रतियोगिता-प्रतिस्पर्द्धा में टिकने की क्षमता अर्जित करने, लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं और संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने के लिए कर्मनिष्ठा के साथ विकेन्द्रीकरण की दिशा में प्रयास करने तथा विविध स्तरों, विशेषतः महिला और युवा-वर्ग के शक्तीकरण (‘सशक्तिकरण’ और ‘सशक्तीकरण’ अशुद्ध शब्द हैं।) की आवश्यकता पर बल दिया था। उनका मानना था कि महिलाओं के सबलीकरण से समाज में स्थिरता आती है।
डॉ० कलाम ने भारत के लिए जो महान् लक्ष्य निर्धारित किये थे, उन्हें पूर्ण करने की अपनी इच्छाशक्ति का जागरण किया था।
मेरे हृदय में उनके प्रति समादर था; प्रतिक्रियास्वरूप ‘रामेश्वरम् से राजपथ तक’ और ‘शून्य से शिखर तक डॉ० अब्दुल कलाम’ कृतियों का मैंने अलग-अलग अवस्था-वर्ग के पाठकों के लिए प्रणयन किया था।
तत्कालीन राष्ट्रपति और ‘मिसाइल मैन’ नाम से प्रतिष्ठित प्रमुख प्रौद्योगिकीविद् डॉ० अब्दुल कलाम के साथ ‘राष्ट्रपति भवन में व्यतीत किये आत्मीय और अन्तरंग क्षणों को अपने पाठक-वर्ग के साथ साझा करना समीचीन समझता हूँ; क्योंकि देश-काल-परिस्थिति-पात्र प्रासंगिक जान पड़ते हैं।
राष्ट्रपति महोदय से मिलना आसान नहीं रहता। इतनी औपचारिकताएँ और वर्जनाएँ रहती हैं कि कोई भी सामान्य व्यक्ति उनसे भेंट कर नहीं पाता। कहाँ सम्पूर्ण भारत के ‘प्रथम नागरिक’ और कहाँ मैं, एक ‘अति सामान्य नागरिक’।
डॉ० कलाम का जब नाम राष्ट्रपति-पद के प्रत्याशी के रूप में सार्वजनिक हो रहा था तब उससे पूर्व ही मैं उन पर एक मौलिक कृति ‘रामेश्वरम् से राजपथ तक’ का प्रणयन आरम्भ कर चुका था। पुस्तक प्रकाशित हुई थी और मैंने उन्हें ‘डॉ० कलाम के नाम’ से राष्ट्रपतिभवन के पते पर भेज दी थी। मैं अन्य कृति के सर्जन में व्यस्त था कि मेरे पास २.३० अपराह्न के समय एक फ़ोन आया था। फ़ोन करनेवाले ने कहा, “मैं डी०एम०, इलाहाबाद बोल रहा हूँ। राष्ट्रपतिभवन में आपको महामहिम राष्ट्रपति जी से मिलने के लिए बुलाया गया है। आप अगले सप्ताह की कोई दो ‘डेट’ बता दीजिए और आपके साथ कितने लोग रहेंगे। ‘मिनट-टु-मिनट’ कार्यक्रम भेज दीजिए।” मैं प्रसन्न इसलिए था कि मैंने पुस्तक ही भेजी थी; भेंट करने की इच्छा व्यक्त नहीं की थी। बहरहाल, मैंने अपनी सारस्वत निधि ‘लोकप्रिय विज्ञानविषयक ३२ पुस्तकों के साथ महामहिम राष्ट्रपति डॉ० कलाम जी से भेंट की थी। पहली भेंट और अवर्णनीय अन्तरंगता! कल्पनातीत रही। उसके बाद अनेक प्रसंग ऐसे रहे, जिनके कारण हम दोनों आत्मीयता के पाश में आबद्ध होते रहे। कालान्तर में, हम ‘दो भाई’ के रूप में मिलते रहे। ‘रामेश्वरम् से ‘राजपथ तक’ बाल-किशोरों के लिए पुस्तक रही। उसके बाद मैंने एक बृहद् पुस्तक ‘शून्य से शिखर तक डॉ० अब्दुल कलाम’ का लेखन किया था।
हम इतने घुल-मिल चुके थे कि कहीं से नहीं लगता था कि मैं किसी राष्ट्रपति के समक्ष हूँ और उन्होंने भी कभी ‘राष्ट्रपति’ होने का अनुभव मुझे नहीं करने दिया था। एक रात्रि श्रद्धेय भ्राताश्री कलाम जी ने कह दिया था, “तुम मेरा ‘चोटा’ भाई है’, फिर जब मैंने उन्हें ‘चोटा’ का अर्थ गहराई के साथ बताया था तब वे खिलखिलाकर हँस पड़े थे। बाद में सुधार करते हुए उन्होंने कहा, ”तुम मेरा ‘छोटा’ भाई है; यंगर ब्रदर; ऐम राइट? ‘छोटा’ को उन्होंने इतना खींच कर कहा था कि मेरी हँसी फूट चुकी थी और छूट भी चुकी थी। अपनी हँसी को किसी तरह से सँभालते हुए, दबाते हुए मैंने फिर कहा, ”आप अब भी अशुद्ध बोल रहे हैं।” तब न जाने कैसे देश के राष्ट्रपति को मैंने एक अति अनुशासित शिक्षक की तरह से टोका था। उनका उत्तर था, ”चोटा को छोटा ‘काह’ दिया, हो गया ना?” मैंने कहा, ”जी नहीं। आपने फिर ग़लत कहा है।” फिर मैंने बताया, ”आप मेरे बोलने के बाद बोलिए—- तुम मेरे छोटे भाई हो।” उन्होंने उसे दोहराया, फिर मैंने कहा, ”अब कहिए— चोटा को छोटा ‘कह’ दिया।”
विविध प्रसंगों पर वार्त्ता करते समय जब मैं स्वास्थ्य, शिक्षा तथा नियोजन-क्षेत्रों में शासकीय नीतियों पर प्रहार करना चाहता था तब अपनी ‘अनामिका’ हिलाते हुए एक अभिभावक की भाँति ‘वर्जना’ का संकेत करते थे।
कालान्तर में, हमारे सम्मिलन में कहीं-कोई औपचारिकता नहीं रही और हम दोनों औपचारिकताओं से दूर एक अलग रूप में स्वयंसिद्ध होते रहे। डॉ० कलाम ‘हिन्दी’ सीखना चाहते थे; उन्हें समय नहीं मिल पाता था। एक स्थिति ऐसी आयी कि उस महामानव ने न जाने क्या सोचा-विचार किया और एक झटके में मुझे ‘गुरु’ बना लिया था।
इसके पीछे भी एक आत्मीय घटना है। हुआ यों कि मेरे हाथों में मेरी एक पुस्तक ‘भारतीय वैज्ञानिक और उनकी देन’ थी। उसको देखते ही उन्होंने मुझसे ले ली। कलाम साहिब टूटी-फूटी हिन्दी बोल लेते थे। मेरी कोशिश थी, उनकी हिन्दी न बोल पाने की झिझक समाप्त करूँ। उनका प्रश्न था, “तुमने (तुम्हारे) इस बुक में क्या है ?” मैंने बताया, “इसमें इण्डियन साइंस्टिट के बारे में है।” फिर वे चहक कर बोले,” मेरा भी।” मेरा उत्तर था, “आप साइंटिस्ट नहीं हैं।” वे विस्मित होकर पूछ बैठे, ”देन ह्वाट?’ (फिर क्या हूँ?) मैंने उन्हें बताया– आपके सभी काम ‘टेक्निकल’ रहे हैं :– ‘उपग्रह’, ‘पेसमेकर’, ‘परमाणुबॉम्ब’ से लेकर ‘मिसाइल’ तक।” तब वे समझ गये थे। मैंने बताया, “आप एक कुशल ‘टेक्नोलॉजिस्ट’ हैं, फिर मैंने बताया,” मेरी पुस्तक में भी ग़लत है।” वे बोले, “हाऊ?” मैंने बताया कि वैज्ञानिक की जगह कुछ और होगा; प्रकाशक ने शुद्ध शब्द बदल दिये हैं। तभी उनके सामने मैंने तीन शब्द लिखे थे और उनके अर्थ पूछे थे। वे शब्द थे :– साइंस, साइंटिस्ट तथा साइंटिफ़िक। मैंने उनसे इन तीनों के अर्थ पूछे थे। उन्होंने कहा,”बिग्यान।” मैंने उच्चारणसहित सुधारा था, “विज्ञान कहिए।” दूसरे शब्द ‘साइंटिस्ट’ का अर्थ ‘बैग्यानिक’ कहा। मैं चुप रहा। जब ‘साइंटिफ़िक’ का अर्थ पूछा था तब अपना सिर खुजलाते रहे और स्वयं से अर्थ लेते हुए गरदन हिलाते रहे; यानी ‘यह नहीं, वह नहीं’ का भाव-प्रदर्शन, फिर जब कुछ नहीं सूझा तब मेरे गाल पर चपत लगाते हुए कहा, “पाण्डे! तू मेरा ट्यूटर बन जा।”

अब तो उनके हाथ का दिया हुआ ‘मट्ठा’ बार-बार याद आता है। उनकी स्मृतियों पर आधारित पाण्डुलिपि ‘क्या भूलूँ-क्या याद करूँ’ रखी हुई है; परन्तु उनके शरीरान्त के बाद मैं बहुत टूट गया था; बिखरा नहीं। एक ‘बड़ा भाई’ सदैव के लिए बिछुड़ चुका था। वे मेरे भविष्य के लिए बहुत-कुछ करना चाहते थे। मैं कहता था,”मुझे सिर्फ़ आपका ‘आशीर्वाद’ चाहिए। इस पर वे नाराज़ होकर कहते थे ,”तू मेरा चोट्टा (छोटा) भाई है न, मेरे को ड्यूटी बनती है तेरे लिए। और लोग आते हैं तो इतना बाड़ा पेपर लेकर आता है और बोलता है :– मेरे लिए ये, वो करना है और तू ‘प्रेजेण्ट टाइम का गांधी जी’ होता है क्या? आय विल फुलफिल योर डीजायर। आस्क मी। बगल की केबिन जब तक मैं रहेगा, तेरे लिए।” इस पर मैंने श्रद्धेय अग्रज कलाम जी का चरणस्पर्श करते हुए कहा था, “भ्राताश्री! मुझे कुछ नहीं चाहिए। इस पर पुन: असन्तुष्ट होकर बोले, “तू जा अब एलाहाबाड। आय विल कम ह्वेरी सून। ‘देन’ हम मिलेगा।”
दूसरे दिन मैं लौट आया था। ‘राष्ट्रपतिभवन’, नई दिल्ली से ‘अलोपीबाग़’, इलाहाबाद की राह तय करते हुए प्रतीत हो रहा था, मानो हम दोनों संवाद करते हुए और एक-दूसरे की जीवनगठरी खोलते हुए दूरी तय कर रहे हों और ‘राजधानी एक्सप्रेस’ मुदित मन से स्वच्छन्द फर्राटा भरती हुई ‘पड़ाव-दर-पड़ाव’ को अर्थपूर्णता प्रदान करते हुए गन्तव्य की ओर बढ़ती जा रही हो।
नीचे श्रद्धेय डॉ० कलाम जी ने मेरे विषय में एक ऐसी टिप्पणी की थी, जिसमें उनका सदाशयता, सौजन्य, सौमनस्य तथा सौहार्द प्रतिबिम्बित होता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ जुलाई, २०२१ ईसवी।)