आज फ़िर रोया हिमालय, निकली है आँसू की धारा

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज) –

राष्ट्र का कण-कण जिनका ऋणी हो गया; उन राष्ट्रदूतों के चरणों में नतमस्तक हूँ…...

आज फ़िर रोया हिमालय, निकली है आँसू की धारा;
डूबे हैं फ़िर कुछ सितारे, आसमाँ   का    बढ़ता पारा।

आज फ़िर रोया हिमालय०….

सिन्धु भी  है सूखा जैसे, व्यपगत हुआ हो नीर सारा;
सूर्य  भी  मद्धिम  है  जैसे, छिन  गया  है  तेज़ सारा।
शान्ति के उड़ते कबूतर, ले के आये विष का प्याला;
होंठ दिखते थे निरामिष, जिह्वा  में  था  भरा  हाला।
कैसे धोयें हरीतिमा  को, जो  हुई    है  रक्त – रंजित;
छूटे  हैं  कुछ  साथी  हमसे, रूठा  है  माँ का सहारा।
डूबे हैं फ़िर कुछ सितारे, आसमाँ   का    बढ़ता पारा।

आज फ़िर रोया हिमालय०……………….

पाक़  कहते  हो  जो ख़ुद को, हैं क़दम नापाक़ सारे;
दिल  है  कालिख़  से भरा, औ  दिखाते  दाँत  प्यारे।
बुज़दिली  तेरी  कहूँ  या फ़िर कहूँ ख़ुद की शराफ़त;
इंसानियत ग़र होती तुझमें ,करते न ऐसी हिमाक़त।
शब्द की अब न ज़रूरत, अब्द  का  भी फटता सीना;
चूड़ियाँ  टूटी हैं अगणित, छूटा  है बहना  का प्यारा।
डूबे हैं फ़िर कुछ सितारे, आसमाँ   का    बढ़ता पारा।

आज फ़िर रोया हिमालय०…….

अब सहन की सीमा टूटी, फूटेगी अब क्रान्ति-ज्वाला;
सामने मक्कार है जब ,कब तक जपेंगे शान्ति-माला?
खोलो   तोपों   के   मुहाने, झूठे  सब  समझौते तोड़ो;
गीता के उपदेश छोंडो, फ़िर चलो शिव-ताण्डव छेंड़ो।
गिर  गया  वटवृक्ष  जिसका, खो  गई  है   पितृ-छाया;
आँखें  तो   पथरा  गई  हैं, हो  गया   ख़ुद    बेसहारा।
डूबे हैं फ़िर कुछ सितारे, आसमाँ   का    बढ़ता पारा।

आज फ़िर रोया हिमालय०…………..