प्लास्टिक थैली-थैलों के प्रतिबन्धित करने का निर्णय और उस पर अमल करने का चरित्र कहाँ खो गया?

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आश्चर्य होता है, जब केन्द्र और राज्य की सरकारें प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबन्ध की बात करती हैं; किन्तु उसमें भी विभेद करती नज़र आती हैं। सरकारें अपनी सुविधा के लिए दो नाम बना लिये हैं :— ‘गुड प्लास्टिक’ और ‘बैड प्लास्टिक’, जो कि एक प्रकार का छलावा है और उसे ख़ुद को सुरक्षित बनाये रखने की एक निन्दनीय आड़ है, जहाँ सरकारें प्लास्टिक-प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहन करती हैं और प्लास्टिक-प्रतिबन्ध करने के लिए पहल भी करती हैं। सरकारों की इन दोगली नीतियों की चतुर्दिक् भर्त्सना होनी चाहिए।

वर्ष २०१५ में उत्तरप्रदेश की अखिलेश-सरकार ने प्रतिबन्धित किया था; परन्तु क्या वह प्रतिबन्ध सफल रहा? बेशक, नहीं रहा। लघु व्यापारियों को परेशान किया जाता रहा है और रिश्वत लेकर जाँच करनेवाले छोड़ दिया करते थे। प्रतिबन्धित करना ही है तो जहाँ से प्लास्टिक का उत्पादन किया जाता है, उन्हें पहले प्रतिबन्धित कीजिए।

अब प्रश्न है, उत्तरप्रदेश-सरकार के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ ने भी एक अभियान ज़ोर-शोर से शुरू किया था, जो वर्तमान में ‘ठण्ढे बस्ते’ में डाल दिया गया है। यद्यपि उन्होंने जिस गति में अभियान आरम्भ कर जनसामान्य को त्रस्त कर दिया था, उससे क्या लाभ हुआ है। वे तो यह ही नहीं बता सके थे कि प्लास्टिक के थैले प्रतिबन्धित हो जायेंगे तो कौन-सा उपयोगी विकल्प लायेंगे। कुछ माह तक कपड़ों के बने थैले प्रचलन में आ गये थे, अब प्लास्टिक के थैले खुले आम व्यवहार में आ गये हैं। ऐसे में देश के प्रधानमन्त्री से भी प्रश्न करना अधिक उपयुक्त है– आपके नीति और निर्णय महज़ दिखावे के लिए हैं? प्लास्टिक के थैली-थैले बनानेवाले कारख़ाने अपना काम कर रहे हैं और शासकीय फ़रमान ‘त्रिशंकु’ की तरह से लटका हुआ है।

महाराष्ट्र-शासन ने प्रतिबन्धित किया था; लेकिन पूर्णत: सफल नहीं रहा है। चौपाटी पहुँच जाइए; समुद्र-किनारे तरह-तरह की ऐसी प्लास्टिक आपको दिख जायेंगी, जिनमें खाद्य और पेय-पदार्थ लिपटे रहते हैं; उन पदार्थों को भरकर उनका पैकेज किया जाता है। देश के समुद्र में जितना भी कूड़ा-कचरा डाला जाता है, उसका ६० प्रतिशत प्लास्टिक का हिस्सा होता है।

आप किसी रेलगाड़ी, बस इत्यादिक के अन्दर देखिए, क़िस्म-क़िस्म की प्लास्टिक के टूटे-फूटे, कटे-फटे टुकड़े भारी मात्रा में प्रतिदिन दिखेंगे। प्रश्न है, वे प्लास्टिक कहाँ फेंकी जाती हैं? देश के बड़े नालों का सरकारें सर्वेक्षण करायें; वहाँ अत्यन्त घातक रूप में प्लास्टिक के अवशेष दिखते हैं, जो अपशिष्ट रूप में प्राणिजगत् के स्वास्थ्य के लिए नितान्त घातक सिद्ध हो रहे हैं।

सुस्पष्ट है, केन्द्र और राज्य की सरकारों में इच्छाशक्ति का अभाव है, अन्यथा जिस तरह से गुटके, खैनी, तम्बाकू, चॉकलेट, टॉफ़ी, तेल, घी, जल, शराब, दूध, दही, मट्ठा, चावल-दाल, आटा, काजू, किसमिस, बादाम-जैसे शुष्क फल, नमकीन, कुरकुरे आदिक प्लास्टिक के थैले और पैकेट में भरकर बेचे जाते हैं, नहीं बेचे जाते।

उत्तरप्रदेश-सरकार ने घोषणा की थी कि १५ जुलाई, २०१८ ई० से किसी भी क़ीमत पर प्लास्टिक थैली-थैलों पर पूर्णत: प्रतिबन्ध लग जायेगा; परिणाम क्या रहा– “ढाक के तीन पात।” अखिलेश यादव के मुख्य मन्त्रित्वकाल में प्लास्टिक-प्रतिबन्ध काग़ज़ पर रहा और धड़ल्ले से प्लास्टिक का प्रयोग होता रहा। वैसा ही परिणाम आदित्यनाथ योगी के आदेश की अवहेलना करते हुए दिख रहा है।

प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध तो उच्चतम न्यायालय की ओर से दशकों-पहले से ही प्रतिबन्धित किया जा चुका है। देश में अरबों लोग-द्वारा जिस मोबाइल का उपयोग किया जाता है, उसमें ख़तरनाक प्लास्टिक की मात्रा बनी रहती है।

हमारे विज्ञानियों ने सिद्ध किया है कि किसी भी प्रकार की प्लास्टिक स्वास्थ्य के लिए नितान्त घातक है।

सच तो यह है कि उत्तरप्रदेश-सरकार की नीयत और नीति पूर्णत: सन्दिग्ध दिखती है; इसके अनेक कारण हैं :—
१- सरकार बेहोश थी। चुनाव नज़दीक आते ही उसे ‘प्लास्टिक थैली’ प्रतिबन्धित करने का होश आया था।
२- हर तरह की प्लास्टिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए घातक है। ऐसे में, प्लास्टिक का ‘गुड प्लास्टिक’ और ‘बैड प्लास्टिक’ के नाम से वर्गीकरण क्यों?
३- जिन प्लास्टिक थैली-थैलियों में पैकेज कराकर सरकार वस्तुओं को विक्रय करने के लिए हरी झण्डी दिखाती है, उन थैली-थैलियों पर सरकार की मेहरबानी क्यों?

प्लास्टिक थैली-थैेलों पर पूर्णत: प्रतिबन्ध तब लग सकेगा जब जहाँ से इनका उत्पादन होता है, उस स्रोत को ही अवैध घोषित कर दिया जाये; उस कारख़ाने को ही प्रतिबन्धित कर दिया जाये। इतना होने के बाद भी पूर्णत: प्रतिबन्ध लगने में एक से दो वर्ष लग सकते हैं; कारण कि जो प्लास्टिक थैली-थैले समाज के बीच हैं; सम्बन्धित व्यवसायियों के पास हैं, वे नष्ट कैसे करेंगे? उनमें उनके रुपये लगे हैं।

जिस दिन सच्चे अर्थों में नरेन्द्र मोदी की इच्छाशक्ति जाग्रत होगी, प्लास्टिक के उपयोग शनै:-शनै: प्रक्रियान्तर्गत बन्द होने शुरू हो जायेंगे; परन्तु इसके लिए सत्ता के प्रति आकण्ठ बने मोह का परित्याग कर, लोकहित के प्रति चिन्तन और व्यवहार का चरित्र अपनाना पड़ेगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ७ जुलाई, २०२० ईसवी)