डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
‘उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग’ ईंट, बालू-सीमेण्ट गारे का बहुप्रकोष्ठीय एक भवन है। वह भवन तो सदैव ‘अचेतन’ की अवस्था में रहा है। ऐसे में, वहाँ से दशकों से भ्रष्टाचार की सन्दूषित गन्ध निकल कर देश के युवावर्ग के मन-मस्तिष्क को जिस प्रकार से विकृत करती आ रही है, उसके लिए वह उत्तरदायी नहीं है; उत्तरदायी तो वहाँ के वह तन्त्र है, जिसके यन्त्र में हम ‘जवानी’ को डालते आ रहे हैं; परन्तु उसमें से ‘बुढ़ापा-ही-बुढ़ापा’ निकलता आ रहा है। यहाँ भी उस यन्त्र में कोई ख़राबी नहीं है; ख़राबी उस यन्त्र में लगे उन सड़े-गले कल-पुर्ज़ों में हैं, जो दशकों से सम्बन्धित तन्त्र के यन्त्र को इस तरह से जकड़ लिये हैं कि उस यन्त्र में ज़ंग लग चुका है। वे कल-पुर्ज़े इतने ज़िद्दी और धृष्ट हो चुके हैं कि जब तक ‘छेनी-हथौड़ी’ के साथ उन पर बल-प्रयोग नहीं किया जाता तब तक उन यन्त्रों से निकलते परिणाम ‘उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग’ के माथे पर कालिख़ पोतते रहेंगे।
अब ज़रूरत है, वहाँ के यन्त्रों की ज़िन्दगी ख़त्म करनेवाले ‘कल-पुर्ज़ों’ को निष्क्रिय कर, उनके स्थान पर नये, धारदार तथा ठोस कल-पुर्ज़े शीघ्रातिशीघ्र लगाने की। ऐसे में, जब उस यन्त्र में ‘जवानी’ डाली जायेगी तब उसमें से ‘तरुणाई-ही-तरुणाई’ निखर कर आयेगी और प्रशासनिक सेवाओं में भारत राष्ट्र का ‘कल’ स्वर्णिम अक्षरों में अंकित होता रहेगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २३ जून, २०१८ ईसवी)