निम्नांकित वाक्य को कारणसहित शुद्ध करें :–
वाक्य– वह महिला अत्यन्त विद्वान महिला है जिसकी विद्वता की चरर्चायें यत्र तत्र सर्वत्र अनुगूंज रही है
अब आप ‘सकारण’ उत्तर ग्रहण करें, जो आपको ‘कहीं भी’ प्राप्त नहीं होगा/ न हो सकेगा।
उपर्युक्त वाक्य में दो पद हैं :– प्रथम, ‘वह महिला एक अत्यन्त विद्वान महिला है’ और द्वितीय, ‘जिसका विद्वता का चर्रचायें यत्र तत्र सर्वत्र अनुगूंज रहे हैं’। इन दोनों ही पदों के वाक्य-विन्यास अशुद्ध हैं। प्रथम पद में ‘विद्वान महिला’ के स्थान पर केवल ‘विदुषी’ का प्रयोग होगा; ऐसा इसलिए कि पुरुष के लिए ही ‘विद्वान्’ (‘विद्वान’ अशुद्ध शब्द है।) शब्द का व्यवहार होता है, जबकि महिला के लिए ही ‘विदुषी’ शब्द का। जैसे– वह विधुर हो गया है। वह विधवा हो गयी है। यहाँ न तो ‘पुरुष’ के साथ ‘विधुर’ का प्रयोग है और न ही ‘महिला’ के साथ ‘विधवा’ का; क्योंकि ‘पुरुष’ ही ‘विधुर’ होता है और ‘महिला’ ही ‘विधवा’ होती है।
इस प्रकार प्रथम पद बना– ‘वह एक अत्यन्त विदुषी है’।
अब अगले पद को शुद्ध करने से पहले आपके लिए यह जानना आवश्यक है कि ‘विद्वान् के लिए विद्वत्ता’ (‘विद्वता’ शब्द अशुद्ध है।) और ‘विदुषी’ के लिए ‘वैदुष्य’ का प्रयोग विशुद्ध कहलाता है। ‘जिसका’ के स्थान पर ‘जिसके’ होगा। चरर्चायें की वर्तनी भी अशुद्ध है, शुद्ध है, ‘चर्चाएँ’, फिर शुद्ध शब्द ‘चर्चा’ है। जब ‘सर्वत्र’ शब्द का प्रयोग होता है तब ‘यत्र-तत्र’ (यहाँ-वहाँ), ‘इतस्तत:’ (इधर-उधर) इत्यादिक शब्दों के प्रयोग अशुद्ध कहलाते हैं; क्योंकि ‘सर्वत्र’ का प्रयोग करते ही ‘दसों दिशाएँ’ जुड़ जाती हैं। अब ‘चर्चा के चरित्र’ को समझते हैं। चर्चा सदैव की जाती है; चर्चा होती भी नहीं है। ‘होती’ में तो ‘अपने-आप’ किसी कार्य का होना होता है। उदाहरण के लिए– उसने चोरी की है। इस घटना का संज्ञान पाते ही हमें कहना पड़ता है– ‘क’ चोर है। इस प्रकार यह प्रचारित-प्रसारित होने लगता है कि ‘क’ नामक व्यक्ति चोर है। यह एक प्रकार की चर्चा है। अब ‘अनुगूंज’ को समझें। मूल शब्द ‘गूँज’ है, न कि ‘गूंज’। इसी से पूर्व ‘अनु’ (पीछे) उपसर्ग का प्रयोग है। इस प्रकार शुद्ध शब्द ‘अनुगूँज’ हुआ। यहाँ यह जानना आवश्यक है कि किसी भी प्रकार की ध्वनि की गूँज होती है और उस ध्वनि के पीछे जो ध्वनि उभरती है, वह ‘अनुगूँज’ कहलाती है। जैसे– एक घण्टा को बजाकर छोड़ दें। उसके बाद उसमें से जो कम्पन उत्पन्न होता रहता है, वह ‘अनुगूँज’ (प्रतिध्वनि) है। दूसरे पद की क्रिया ‘अपूर्ण वर्तमान/वर्त्तमान काल’ की है, इसलिए शुद्धता के समय क्रिया में कोई परिवर्त्तन नहीं होगा। इस पद में विदुषी की ‘विशेषता’ बतायी जा रही है, इसलिए ‘अत्यन्त’ के स्थान पर कर्त्ता के लिंगानुसार ‘ऐसी’ का व्यवहार किया जायेगा।
उक्त तथ्यों और तर्कों के आधार पर जिस शुद्ध वाक्य की रचना होती है, वह है—
वह एक ऐसी विदुषी है, जिसके वैदुष्य की चर्चा सर्वत्र की जा रही है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० मार्च, २०२१ ईसवी।)