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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

‘ललकार’ के साथ सुनें-पढ़ें खरी-खरी

हमारे देश के ख़ूब पढ़े-लिखे-कढ़े लोग से एक रोग के उपचार के लिए चिकित्सककक्ष में पहुँचने से पूर्व ही ‘पाँच सौ रुपये’ परामर्शशुल्क के रूप में रखवा लिये जाते हैं और वे प्रसन्नतापूर्वक दे भी देते हैं; परन्तु कोई भाषाकार एक शब्द का संबोध कराने के लिए ‘पचास रुपये’ माँगे तो सब भाग खड़े होंगे। यह है, ‘विद्या’ और हमारे ‘विद्वज्जन’ का सम्मान!
यदि चिकित्सक-द्वारा उपचार करते समय रोगी अथवा उसके साथ का व्यक्ति कुछ पूछता है तो वह चिकित्सक उसे डाँट देता है, फिर ‘बोलती’ बन्द हो जाती है; परन्तु जो विद्वज्जन निश्शुल्क ज्ञानदायिनी परम्परा को पुनरुज्जीवित (‘पुनर्जीवित’ अशुद्ध है।) किये हुए हैं, वे सहज भाव से प्रासंगिक प्रश्न-प्रतिप्रश्न के उत्तर-प्रत्युत्तर देते आ रहे हैं। उनका ध्येय रहता है कि जो सीख नहीं पाये हैं, उन्हें सिखाया जाये और उनके बोधस्तर को हिमालय-जैसा उच्च और सागर-सदृश गहन किया (यहाँ ‘दिया’ शब्दप्रयोग अशुद्ध हैं) जाये, जिससे कि उनके ज्ञानवर्द्धन से शेष समाज का ‘सारस्वत’ हित हो जाये। खेद है, वैसे विचक्षण-समुदाय के प्रति हमारा समाज कितना कृतघ्न बना रहता है, जिसे सुन-पढ़-देखकर मन उद्विग्न और कातर हो उठता है!

सच तो यह है कि कथित पढ़े-लिखे लोग में से ‘नब्वे’ प्रतिशत (‘नब्बे, नभ्भे इत्यादिक अशुद्ध शब्द हैं।) उस श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं, जिन्हें ‘हिन्दी’ समझने के लिए पाँचवीं-छठी (‘छटी’, ‘छटीं’, ‘छठीं’ तथा ‘छठवीं’ अनुपयुक्त शब्द हैं।) कक्षाओं के व्याकरण की पुस्तकों का विधिवत् अध्ययन करना होगा। यहाँ जो शेष ‘दस प्रतिशत’ दिख रहे हैं, उनमें से ‘पाँच प्रतिशत’ लोग यही नहीं जानते कि ‘श, ष’ का शुद्ध उच्चारण किस प्रकार और कहाँ होता है? अब जो पाँच प्रतिशत शेष दिख रहे हैं, उनमें से ‘दो प्रतिशत’ यही नहीं जानते कि ‘ज्ञान’, ‘कंचन’, ‘कृतज्ञ’ तथा ‘शुश्रूषा’ (‘सुश्रूषा’ अशुद्ध है।) का शुद्ध उच्चारण किस प्रकार होता है। यही ‘दो प्रतिशतवाले’ लोग शब्दों में हिन्दी-अंक का शुद्ध लेखन भी नहीं कर सकते। इस प्रकार जो ‘तीन प्रतिशत’ रह गये हैं, वे ही हमारी हिन्दी की विशुद्धता की रक्षा करते आ रहे हैं; परन्तु उनमें से अधिकतर (यहाँ ‘अधिकांश’, ‘अधिकाँश’ शब्द अशुद्ध हैं।) में ‘जड़ता’ आ गयी है; ‘उदासीनता’ भी कह सकते हैं; मौन धारण किये रहते हैं। कोई अशुद्ध वाचन-लेखन करे तो उसके प्रति उनकी ‘सजगता’ नहीं दिखती।

आश्चर्य तब होता है जब वे ‘नब्वे प्रतिशत’ लोग स्वयं को व्याकरणाचार्य, भाषाविद्, भाषाविशेषज्ञ, भाषा विज्ञानी, हिन्दी-प्राध्यापक, हिन्दी-प्राश्निक, हिन्दी-परीक्षक, राजभाषा-अधिकारी, हिन्दी-अधिकारी, समाचारपत्र-पत्रिकाओं, प्रसारभारती (आकाशवाणी- दूरदर्शन), समाचार-चैनलों के सम्पादक, वाचक, लेखक बताते हैं; परन्तु वाक्यविन्यास, शब्दप्रयोग, अभिव्यक्ति (उच्चारण) तथा व्याकरण और भाषाविज्ञान के स्तर पर ‘नितान्त खोखले’ सिद्ध होते हैं। ऐसे लोग को यदि शब्दानुशासन से परिचित भी कराया जाये तो उनके भीतर का सुषुप्त ‘भस्मासुर’ जाग्रत् होने लगता है और उनकी ललाट पर ‘अहम्मन्यता’ की शिरोरेखा उनकी बुद्धि को कुन्द करने लगती है।

अब ज़रा सोचिए :– हिन्दी को अपमानित करनेवाले कुपात्रों की संस्तुति पर ‘हिन्दीगौरव’ बन गये; बारह खड़ी का संज्ञान नहीं, ‘भाषाभूषण-विभूषण’ बना दिये गये। मौखिक और लिखित वाक्यप्रयोग में अशुद्धियाँ-ही- अशुद्धियाँ, ‘हिन्दी सम्राट्’ (‘सम्राट’ अशुद्ध शब्द है।) के बेसुरे सारंगीवादक बना दिये गये। इस कोटि के न जाने कितने मानवतनधारी जीव इस धरती पर बोझिल शरीर लिए (यहाँ ‘लिये’ का प्रयोग अशुद्ध है।) जी रहे हैं और ऐसे ही स्वनामधन्य लोग हमारी हिन्दीभाषा, हिन्दीव्याकरण, हिन्दीविज्ञान, हिन्दीसाहित्य को ‘हस्तामलक’ समझते हुए, ‘हिन्दी’ के अंगोपांग के साथ बलप्रयोग करते आ रहे हैं।

ऐसे लोग ‘हिन्दी’ का क्या और कैसे भला कर सकते हैं, विचारणीय बन जाता है।

(आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ मई, २०२१ ईसवी।)