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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

विद्यार्थियों के लिए ऐसी शिक्षा किस काम की?

टी० ह्वी० पर विद्यार्थियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से ‘किशोर-मंच’ नामक एक ‘चैनल’ संचालित किया जाता है।

चित्र– उसी अध्यापक का है, जो बच्चों को ‘पढ़ा’ रहा था

आज (३ जुलाई) ‘किशोर-मंच’ चैनल पर रात्रि ११ बजे एक शिक्षक कक्षा नौ की पुस्तक स्पर्श, पाठ ५– ‘धर्म की आड़’ भाग– १ को पढ़ा रहा था और टी० ह्वी० के पर्दे (‘परदा’, ‘परदे’ शब्द अशुद्ध हैं।) पर सबसे नीचे ‘धरम की आड़’ (शुद्ध शब्द ‘धरम’ है।) दिखाया जा रहा था। वह अध्यापक बच्चों को पढ़ाते समय बहुत अशुद्ध उच्चारण कर रहा था। उसे ‘श’ और ‘ष’ का उच्चारणबोध था ही नहीं। विद्यार्थियों को किस भाषा-शैली में समझाना चाहिए, इससे वह अनभिज्ञ दिखता रहा। वह अध्यापक आलोचना को ‘निन्दा’ के रूप में समझा रहा था। टी० ह्वी० पर जिस मुद्रित पाठ को दिखाया जा रहा था, उसमें कई अशुद्धियाँ थीं; जैसे– स्वार्थों, दुहाइयाँ; जिस दिन, ; रूढ़ियो का पालन; परदा डालना; हमको विरोध कर रहा था आदिक।

वह अध्यापक ‘धर्म’ को समझाने के लिए ‘कर्मकाण्डी धर्म’ का आश्रय लेता रहा; किन्तु एक बार भी धर्म का शाब्दिक अर्थ नहीं बता सका। वह सम्बोधन करते हुए ‘बच्चों!’ का उच्चारण कर रहा था। गणेश शंकर विद्यार्थी के विषय में बताते समय वह अध्यापक गणेश शंकर विद्यार्थी के लिए ‘आप’ का प्रयोग कर रहा था, जबकि उसे ‘उन्हें’ का प्रयोग करना चाहिए था। ‘आप’ का प्रयोग तब किया जाता है जब गणेश शंकर विद्यार्थी उस अध्यापक के कार्यक्रम में उपस्थित रहते।

वह मौखिक और लिखित भाषाओं में ‘धूम’ का अर्थ ‘प्रचलन’ बता रहा था।

अब प्रश्न है, क्या यही शिक्षा का स्तर है?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ जुलाई, २०२१ ईसवी।)