आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला


◆ निम्नांकित शब्द उत्तरप्रदेश के आंचलिक बोली-व्यवहार के अन्तर्गत आते हैं। आंचलिक शब्दों का कोई ‘सर्वमान्य’ व्याकरण नहीं है, इसीलिए स्थानिक भाषा का कोई स्वतन्त्र व्याकरण नहीं होता और उन्हें ‘बोली’ का नाम दे दिया गया है। भोजपुरी और अवधी बोलियों में अत्यधिक साम्य है।

आइए! अब अधोटंकितशब्दों का परीक्षण करें :—
१- आहे– भोजपुरी।
अर्थ– अनुमान, अन्दाज़ा।
उदाहरण :–
(क) आहे पर कवनो बात ना कहे के चाहीं।
(ख) आ ए बाबू! आहे पर गरई ना पकड़े के चाहीं।
(ग) तू त बाड़ा काम के हउव; आहे पर गरई पकड़ि लेल।
— ‘गरई’ एक प्रकार की छोटी मछली होती है।
२- थूर– भोजपुरी (क्रियात्मक शब्द)।
अर्थ–कूच (बुरी तरह से ऐसी मार मारना कि शरीर के कई अंग कट-छिल जायें)
उदाहरण :–
(क) उ ना मनिहें त उनकरा के अइसन थूर की एने आइल छोड़ि देस।
(ख) ओ सार के ओहिजे थूर दे।
(ग) एइजा से उठ ना त तहरा के थूर-थार के अकोर कइ देब।
— ‘थूर’ से ही ‘थूरना’ का सर्जन होता है।
३- बकचोन्हर– भोजपुरी।
अर्थ– किंकर्त्तव्यविमूढ़।
४- आब्या– पूर्वी हिन्दी।
अर्थ– आयेगा।
५- अहै– पूर्वी हिन्दी।
अर्थ– है।
६- खातु हैं।— पश्चिमी हिन्दी।
अर्थ– खाते हैं।
७- चल्या– पश्चिमी हिन्दी।
अर्थ– चलो।
८- गवा– पूर्वी हिन्दी।
अर्थ– गया।
९- बाटे– भोजपुरी।
अर्थ– है।
१०- हँसिकै– पश्चिमी हिन्दी।
अर्थ– हँसकर।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ७ नवम्बर, २०२० ईसवी।)