● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
इस बार त्रिपुरा राज्य मे ६० सीटों के लिए कराये गये चुनाव मे कुल २५९ उम्मीदवार मैदान मे थे। भारतीय जनता पार्टी (५५ सीट) का अपने सहयोगी दल ‘आई० पी० एफ० टी०’ (५ सीट) के साथ मिलकर अपनी सरकार का पुनर्गठन कर पाना, “टेढ़ी खीर” लग रहा है, यद्यपि इस दल ने अपने सरकारी संसाधनो का खुला दुरुपयोग करते हुए, व्यापक स्तर पर चुनावप्रचार-प्रसार किया था। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह तथा पोस्टर ब्वॉय आदित्यनाथ योगी ने अपने तथाकथित ‘हिन्दुत्व’ की पूरी ताक़त झोंक दी थी। इसके बाद भी ऐसा प्रतीत होता है, मानो यहाँ ‘हिमाचलप्रदेश’ का चुनाव-परिणाम दोहराया जायेगा। यहाँ ‘त्रिशंकु’ की स्थिति से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है। वैसी दशा मे ४३ सीटों पर लड़ी मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी और मात्र १३ सीटों पर लड़ी काँग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा है; क्योंकि उनका साथ देने के लिए त्रिपुरा के शाही-वंश के उत्तराधिकारी प्रद्योतबिक्रम माणिक्य देवबर्मन की नयी पार्टी ‘टिपरा मोथा’ और कुछ वे स्वतन्त्र विजयी उम्मीदवार सामने आ जायेंगे, जिनको भीतर-ही-भीतर काँग्रेस और वामपन्थी दल समर्थन करते दिखे हैं और जिनका जीतना लगभग तय है। एक अन्य सम्भावना भी दिख रही है और वह है ‘त्रिशंकु’ की स्थिति। वैसी स्थिति मे भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता जीते हुए उम्मीदवारों की ख़रीद-फ़रोख़्त और अपनी पैंतरेबाज़ी के घिनौने कृत्य से पीछे नहीं हटेंगे, जो विपक्षियों के जीत के समीकरण को असंतुलित कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कतिपय छोटे-छोटे दल तथा निर्दलीय के रूप मे जो ५८ प्रत्याशी चुनाव लड़े थे, उनका सकारात्मक-नकारात्मक चरित्र भी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है।
८० प्रतिशत से भी अधिक मतदान का होना, इस बात का संकेत है कि वहाँ कुछ ‘नया’ होनेवाला है। २८ सीटों पर लड़नेवाली ‘तृणमूल काँग्रेस’ को वहाँ के बंगालियों का मत मिलना तय है और मुसलमानो का काँग्रेस को। यह समीकरण भा० ज० पा० को सत्ता से बाहर करने मे मददगार सिद्ध हो सकती है। विपक्षी दल महँगाई और बेरोज़गारी का अपना मूल विषय बनाकर चुनाव लड़े थे।
भारतीय जनता पार्टी के विरोध मे दिख रहे कारण :―
● भारतीय जनता पार्टी की सरकार पिछले बार के चुनावी वायदे पूरे नहीं कर पायी है।
● इस बार के घोषणापत्र मे बेरोज़गारों के लिए किसी भी सुविधा की घोषणा नहीं।
● इस बार महँगाई का सवाल तलवार की तरह लटका है।
● राजनीतिक हिंसा से जनता त्रस्त हो चुकी है।
● वामपन्थी दल और भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी का गठबन्धन तथा भारतीय जनता पार्टी की नीतियों से असंतुष्ट ‘त्रिपुरा मोथा’ की ‘आपसी समझ’ और ‘आपसी आवश्यकता’ के आधार पर उक्त दोनो दलों का भीतरी समझौता भारतीय जनता पार्टी की राह का काँटा बन सकता है।
ये सभी कारण मिलकर इस बार भा० ज० पा० की ताबूत मे आख़िरी कील ठोंक सकते हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ फ़रवरी, २०२३ ईसवी।)