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प्रेमचन्द के उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ : एक चिन्तन

प्रेमचन्द की जन्मतिथि (३१ जुलाई) पर विशेष प्रस्तुति

‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान में आज (३१ जुलाई) एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया। प्रेमचन्द की १४१ वीं जन्मतिथि के अवसर पर आयोजित ‘प्रेमचन्द के उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ’ विषय पर देश के प्रतिष्ठित प्रबुद्धवर्ग की प्रभावकारी वैचारिक भागीदारी रही।

इस अवसर पर आशा राठौर (सहायक प्राध्यापक– हिन्दी-विभाग, शासकीय महाविद्यालय, हटा, दमोह (म०प्र०) ने कहा, “प्रेमचन्द जी हिन्दी के एक ऐसे आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपने साहित्य में सामाजिक यथार्थ का चित्रण तो किया ही है, श्रेष्ठ मानव-समाज के स्थापना-हेतु पथप्रदर्शन भी किया हैं। उनके साहित्य के केन्द्र में मानव-समाज है। तत्कालीन समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता, दहेज-प्रथा, स्त्री-शोषण, वेश्यावृत्ति, अनमेल विवाह, विधवा-समस्या, जातीय भेदभाव और छुआछूत, साम्प्रदायिक विद्वेष, धार्मिक कर्मकाण्ड, अन्धविश्वास, सामन्ती संस्कार और सर्वप्रमुख पद-दलित मानव एवं कृषक-वर्ग की ऋण समस्या को केन्द्र में रखकर उनके कथा एवं उपन्यासों का ताना-बाना बुना गया है। ‘प्रेमाश्रम’, ‘गोदान’, ‘गबन’ ‘कर्मभूमि’ ‘रंगभूमि’ आदिक ऐसे उपन्यास हैं, जिनमें तत्कालीन मानव-समाज जीवन्त हो उठा है।”

पंकज कुमार दुबे (विभागाध्यक्ष– हिन्दी, डी० ए० वी० मॉडल स्कूल, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल) का मत है, “मुंशी प्रेमचन्द सामाजिक संवेदना के संवाहक माने जाते हैं। उनके उपन्यासों में मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग के सामाजिक समस्याओं तथा जीवन के यथार्थ का चित्रण बहुत ही स्वाभाविक रूप से किया गया है। अगर हम उनके प्रसिद्ध उपन्यासों की बात करें तो वह समाज में व्याप्त बुराइयों को दर्शाते हैं। ‘सेवासदन’ में उन्होंने तत्कालीन जनचेतना और जन-आकांक्षा को वाणी दी है। प्रेमचंद ने जहाँ ‘प्रेमाश्रम’ में विधवा समस्या और ग़रीब किसानों पर होनेवाले अत्याचार पर विचार किया है वहीं ‘सेवासदन’ में नारी-पराधीनता के एक महत्त्वपूर्ण अंश वेश्या- समस्या के मूल कारणों और उसके निराकरण पर भी विचार किया है। प्रसिद्ध उपन्यास ‘गोदान’ में ग्रामीण-जीवन, मज़्दूरों और किसानों पर होनेवाले निर्मम अत्याचार, व्यक्तिगत सम्बन्ध, पारिवारिक जीवन की समस्याओं, सामाजिक समस्याओं आदिक को दर्शाया है। ‘निर्मला’ में प्रेमचंद ने दहेजप्रथा-जैसी सामाजिक कुरीतियों का पर्दाफ़ाश करते हुए बेमेल विवाह के परिणाम को दिखाया है। मुंशी प्रेमचन्द के सभी उपन्यासों में सामाजिक परिवर्त्तन और ग़रीब किसान-मज़्दूर के शोषण, वेश्यावृत्ति, बालविवाह, विधवा-समस्या-जैसी सामाजिक बुराइयों के प्रति समाज को आईना दिखाने का प्रभावपूर्ण कार्य किया गया है।”

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ (सम्पादक– आई०वी०24 न्यूज़ और ‘अवध रहस्य’ राष्ट्रीय साप्ताहिक समाचारपत्र, लखनऊ) की अवधारणा है, “मुंशी प्रेमचन्द के कर्तृत्व में आदर्शवाद और यथार्थवाद का अनोखा मेल दिखता है; साथ ही प्रेम, करुणा, रुढ़िवाद, समाज-सुधार, स्त्री-व्यथा, मध्यवर्गीय मनुष्य की त्रासदी, कृषक-जीवन की समस्याएँ, मिहनतकश जनता का संघर्ष आदिक जीवन-संदर्भों का प्रभावोत्पादक चित्रण हुआ है। इन सभी विशेषताओं के बावुजूद, प्रेमचन्द का साहित्य वामपन्थी खण्डहर में चीख़ता दिखता है। एक ओर प्रेमचन्द के ग़रीब पात्र परिश्रमी होते हुए दो बूँद पानी के लिए तरसते हैं तो दूजे ओर साहूकारों-ठाकुरों के खेत-खलिहानों-घरों में काम करते हुए भी अछूत दिखते हैं। प्रेमचन्द के साहित्य में क्रान्ति का ओजस्वी स्वर है; लेकिन क्रान्ति की धरा उर्वर नहीं दिखती।”

चेतना चितेरी (कवयित्री, प्रयागराज) ने बताया, “दलित शोषित-सर्वहारा-वर्ग के प्रति सहानुभूति प्रकट करनेवाले लोकप्रिय साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द का साहित्य-जगत् में आगमन अप्रतिम स्थान रखता है। युग की वाणी को मुखरित करनेवाला साहित्य ही महान् होता है। साहित्यकार के संस्कार और उसकी प्रतिभा की समन्वित शक्ति ही युग-चेतना को ग्रहण कर उसे अभिव्यक्ति प्रदान करती है। इस दृष्टि से देखा जाये तो प्रेमचन्द अग्रणीय है। सामाजिक चेतना का मुख्य स्वर उनके उपन्यासों में उभरता दिखता है। उनकी इस औपन्यासिक गुणों से समन्वित प्रतिभा का आकलन करने के उपरान्त बांग्ला-कथाकार शरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें ’उपन्यास-सम्राट्’ की संज्ञा से विभूषित किया था।”

आदित्य त्रिपाठी (सहायक अध्यापक, हरदोई) का कहना है, “प्रेमचन्द के साहित्य ने निश्चित तौर पर हिन्दी-साहित्य को समृद्ध कर उसे एक अर्थपूर्ण दिशा दी है। प्रेमचन्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने वह अपने दौर में रहे हैं। कृषक-जीवन पर उनकी पकड़ और यथार्थवादी लेखन देखकर उनकी प्रासंगिकता स्वतः बढ़ जाती है। महिलाओं के विषय में भी प्रेमचन्द के विचार और लेखन गम्भीर प्रकृति का है। उनके महिलावादी दृष्टिकोण से आनेवाले लेखकों ने सीख भी ली; लेकिन अपने साहित्य से उलट वे निजी जीवन में स्वान्तः सुखाय का अनुकरण करते पाये जाते हैं। प्रेमपाश में जकड़े प्रेमचन्द ने अपनी धर्मपत्नी को मनोनुकूल न पाते हुए एक बालविधवा शिवरानी देवी से विवाह कर लिया और अपनी पत्नी को अभिशप्त जीवन जीने के लिए विवश कर दिया। प्रेमचन्द के साहित्य का आधार अगड़ों का विरोध है और तत्कालीन समय के समाजवादी आन्दोलन के साये में इसी के बूते कथा-साहित्य के महान् हस्ताक्षर बन जाते हैं।”

शकुन्तला (सहायक प्राध्यापक– हिन्दी-विभाग, आइ० बी० स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पानीपत, हरियाणा) ने कहा, “मुन्शी प्रेमचन्द जी अपने साहित्य में सामाजिक जीवन के यथार्थ का परिचय देनेवाले ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपने उपन्यासों में ग़रीब कृषक की दयनीय स्थिति, दहेज-प्रथा, बेमेल विवाह, भेदभाव, छुआछूत, पिछड़ापन, नशा, अशिक्षा, भूमि-अधिग्रहण, भारतीय युवाओं के गिरते नैतिक मूल्यों आदिक विभिन्न सामाजिक बुराइयों को दर्शाया है। उनके सामाजिक उपन्यास लिखने का मुख्य प्रेरणास्रोत सामाजिक जीवन और समाज-कल्याण के प्रति उनका उत्साह था। यथार्थवादी चित्रण और समस्याओं के विश्लेषण के साथ समाज को जागरूक करना ही उनका उद्देश्य था।”

रणविजय निषाद (प्रभारी प्रधानाध्यापक, उच्च प्राथमिक विद्यालय, कन्थुआ, कड़ा, कौशाम्बी) ने बताया, “प्राचीनकाल से अद्यतन कहानियाँ कई रूपों में लिखी जा रही हैं, जिनमें साहित्यकार वैयक्तिक निराशा, कुण्ठा, आघात-प्रतिघात तक ही सीमित रहते हैं, जबकि मुंशी प्रेमचन्द जी की कहानियाँ समाज-द्वारा तिरस्कृत वर्ग को जिजीविषा के लिए प्रेरित करती दिखती हैं। उनका कथालोक देशभक्ति, दया, करुणा, ईमानदारी आदिक को रेखांकित करते हुए सकारात्मक मूल्यों से युक्त है।”

डॉ० सपना दलवी (हिन्दी-प्राध्यापक, कुमारेश्वर पदवी पूर्व कॉलेज, सवंदती, धारवाड़, कर्नाटक) ने बताया, “प्रेमचन्द ने उपन्यासों के माध्यम से, शिक्षा, धर्म, अस्पृश्यता, नारी- स्थिति, किसानों का शोषण आदिक का चित्रण कर, समाज में नयी चेतना जाग्रत् की थी। उन्हें अपने समय के समाज की गहरी समझ थी, जिस कारण वे हमेशा समाज में किसी भी तरह के छुआछूत का शक्त विरोध करते थे। प्रेमचन्द वर्णव्यवस्था, ऊँच- नीच के भेदभाव और धार्मिक पाखण्ड की जड़ खोदने को राष्ट्रीयता की पहली शर्त मानते थे। शास्त्रों की आड़ में दलितों के मन्दिर प्रवेश को पाप ठहराने वालों को जवाब देते हुए प्रेमचन्द ने ऐसे लोग की विद्या-बुद्धि-विवेक पर सवाल उठाये थे।”

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (परिसंवाद-आयोजक, प्रयागराज) ने कहा, “प्रेमचन्द सामाजिक संघर्ष और अन्तर्द्वन्द्व के लेखक हैं, इसीलिए उनके उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ का प्रत्यक्षीकरण होता रहता है। प्रेमचन्द हिन्दी के ऐसे प्रथम कथाशिल्पी हैं, जिन्होंने कथा विषय को सामाजिक यथार्थ की सुदृढ़ शिला पर प्रतिष्ठित किया है। उपन्यास के क्षेत्र में उद्देश्य, कथानक, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, शिल्पगत विधान, परिवेश तथा संज्ञान में संज्ञात चेतना और वास्तविक जीवन का स्पन्दन है। हिन्दी-साहित्य की प्रवृत्तियों, विषय-वस्तुओं, रूप-विधानों तथा उपकरणों का अनुशीलन करने के पश्चात् निष्कर्ष प्राप्त होता है कि प्रेमचन्द का कर्तृत्व असाधारण क्रान्तिकारी, यथार्थवादी तथा राष्ट्रीय जीवन-धारा के सन्निकट रहा है।”