एकला चलो रे….!

दुष्ट या अहंकारी मनुष्य एकला ही चलना चाहता है।
जबकि पारस्परिकता के बिना मानवीय जीवन जीना सम्भव नहीं है। दूसरे से मिलकर जीना ही मानवीय सभ्यता है।

समाजशास्त्र कहता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक सभ्यता के बिना मनुष्य पशुतुल्य हो जायेगा।
किसी भी बात के लिए सदैव सत्य के सिद्धांत पर आधारित विचार को ही स्वीकार करें।
निराधार प्रवचनों से बचें।

“एकला चलो रे….!”
यह एक फर्जी विचार है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे निराधार विचारकों ने धरती को भीषण संकट में डाला रखा है।
मानव जीवन में सहजीवन-साहचर्य और सहयोग-सहकार अनिवार्य है।
समाज में जो जिस कर्म के योग्य है, उसे उस कर्म में नियोजित करके ही सामाजिक सभ्यता विकसित हो सकती है।

एकला तो केवल ईश्वर ही चल सकता है, मनुष्य नहीं।
मनुष्य तो सामूहिक और सामाजिक प्राणी ही है।
सामाजिकता और राष्ट्रीयता ही मनुष्य की मूल सभ्यता है।
और पारस्परिक समाधिकारिता ही मनुष्य का मूल व्यवहार है।

इक्कड़पने का अहंकार मनुष्य को शोभा नहीं देता।
मनुष्य को पारस्परिक सहजीविता, सहकारिता, सहयोगिता और सामंजस्यता सिखाने की जरूरत है।
एकला चलो की मूढ़ प्रेरणा नहीं, यह मनुष्य के लिए हानिकारक है। यह मनुष्य को स्वार्थी और परद्रोही बनाती है।
सहयोगिता से ही मनुष्य में प्रेम का विकास होगा जिससे मनुष्य को सुखशान्ति प्राप्त होगी।

✍️🇮🇳 (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)