सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

अपना अतीत किसे याद नहीं रहता?

चिंतन:- सधी नर्तकी नचति नटी सी।
रुचि- रुचि मनन कियो।
आजु लौं एकु न प्रश्न कियो ।।

अपना अतीत किसे याद नहीं रहता?

वर्तमान में भविष्य की सुखद कल्पनाओं के संगम में उठती ऊर्ध्व-पतन की लहरों में जीवन-नौका अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती चली जाती है। जीवन की परिधि को और अधिक विस्तृत करने का अधिकार यदि मनुष्य को प्राप्त हो जाता तो सुख, शांति, आनंद और वैभव की प्राप्ति हेतु उसका पागलपन और बढ़ जाता; किंतु भौतिक उपलब्धि के प्रयास ज्यों ज्यों सार्थक होते जा रहे हैं जीवन की परिधि उसी अनुपात में संकुचित होती जा रही है। समझ में यह नहीं आता कि चरमोत्कर्ष बिंदु पर इसकी स्थिति क्या होगी ? किसी के पास अब इतना अवकाश कहाँ रहा,जो दैनिक कार्यों से मुक्ति पाकर दो क्षण संसार से विमुख हो चर्म नेत्रों को बंद कर अंतर के नेत्रों को खोल कर मन के दर्पण में अपने को देखे। उस पर जमीं हुई कालांतर की धूलि को परिष्कृत विचारों के माध्यम से उसे स्वच्छ करे ताकि उसे अपना वास्तविक प्रतिबिंब दृष्यगत हो सके। कोई ऐसा नहीं करता, मुझे इस पर उतना दुख नहीं होता जितना कि इस बात का कि मैं स्वयं विवश हो इन सभी के साथ क्रमानुक्रम मे सम्मिलित होता जा रहा हूं ।

समय के प्रवाह में प्रवाहित जीवन की नित की घटनाएं पीछे छूटती जाती हैं। महत्वपूर्ण घटनाएं दिवस निसि की अनुक्रमाणिका में विशिष्टता प्राप्त कर मानस पटल पर स्मृति रेखाओं के रूप में अंकित होती जाती हैं। यही स्मृतियाँ पश्चात में वर्णन करने पर बड़ी रोचक लगती हैं।
मुझे एक छोटी सी घटना कभी-कभी याद आती है। मुझे मेरी घड़ी अत्यंत प्रिय है।

रेडियो मेरा प्रिय और प्रथम मित्र है यह अलग की बात है मैं उससे बातें नहीं कर सकता और पुस्तकें तो मेरी सहचरी हैं । एक बार की बात है कि निशीथ की तंद्रावस्था में अपने मित्र के गीतों को सुनते- सुनते वैचारिकी में अवगाहन करते हुए पता नहीं कब निद्रा देवी की गोद में विश्राम करने लगा । चूंकि निर्धारित समयोपरांत सभी रेडियो स्टेशन बंद हो जाते हैं, इसलिए वह चुप हो गया । किसी आहट से जब मेरी निद्रा भंग हुई तो यामिनी अपने यात्रा समापन की ओर बढ़ चली थी। कृत्रिम दीपिका के प्रकाश में जब घड़ी पर दृष्टिपात किया तो उसमें अभी दो बजकर चालीस मिनट ही हुए थे। मैं पुनः शैय्या पर चित हो विचारों के महासागर की उत्ताल तरंगों पर विचरण करने लगा। किंतु “यह क्या ? क्या प्रातः वेला आज अपने समय से पूर्व आ गई ? या फिर रात्रि ने अपना मार्ग आज शीघ्रता से पूर्ण कर लिया ? नहीं- नहीं ऐसा नहीं हो सकता । यह अपने निर्धारित समय पर ही सदैव आती जाती है। तब फिर……?

पुनः जब घड़ी को सावधानी से देखा तो पाया कि मेरी घड़ी ही बंद थी संभवत: थक गई होगी” ।
मैं शैय्या को त्याग, दैनिक क्रिया से निवृत्ति पाने हेतु उद्विग्नि मन से जल पात्र ले आश्रय स्थल से निकल पड़ा। मार्ग में सोचता रहा कि आज जिस तरह मेरी घड़ी ऊर्जा समाप्ति के कारण निर्जीव की भांति ठहर गई और मै इसे समझ ना सका। इसी तरह मेरी हृदय रूपी घड़ी किसी भी निसि अथवा बासर में ठहर जाएगी और इसे न मैं जान सकूंगा और न ही दूसरे लोग । मेरा मित्र पुनः गीत गाएगा लेकिन उसके गीत मुझे सुनाई नहीं पड़ेंगे। मेरी सारी पुस्तकें जहां की तहां पड़ी रह जाएंगी। यहां से मेरा संबंध सर्वदा के लिए समाप्त हो जाएगा । अतीत के पृष्ठ सदा के लिए बंद हो जाएंगे । आनंद की खोज में पागल पथिक की भांति विचारों तथा जिज्ञासाओं की पोटली बांधे मैं अज्ञात लोक की यात्रा पर निकल जाऊंगा ।

घटनाकाल- १९८९

अवधेश कुमार शुक्ला ‘मूरख’ हिरदय पितृ-विसर्जन, अमावस्या, आश्विन कृष्ण २५/०९/२०२२