
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
धर्म और राजनीति की गलबँहिया का परिणाम— सारे बाबा-बाबियाँ फल-फूल रही हैं। नेतागण आश्रमों में जाकर प्रकारान्तर से ‘वोट की राजनीति’ करते आ रहे हैं।
आज राम का प्रभाव इसलिए नहीं दिख रहा है कि ‘रामनामी’ की आड़ में व्यभिचारियों और यौन-बलात्कारियों ने ‘राम’ का आवरण ओढ़ लिया है। स्वतन्त्र रूप में प्रकरणों की जाँच यदि करायी जाये तो ‘यौन-कुण्ठित’ कई चर्चित राजनेताओं की बीभत्स कर्मकुण्डली सामने आ सकती है, जो बाबा-बाबियों के आश्रम में जाकर ‘साष्टांग प्रणाम’ की मुद्रा में आकर अपनी यौनिक सम्भावनाओं की तलाश करते हैं और बाबा-बाबियों को वे सारी सुरक्षाएँ उपलब्ध कराते हैं, जो उद्दाम कृत्यों को सायास-अनायास निष्पादित करने में सहायक सिद्ध होती हैं।
ये कुकृत्य हमारे राजनेता आज़ादी के बाद से अब तक करते आ रहे हैं; क्योंकि उन कथित ‘धर्माधिकारियों’ के लाखों अनुयायी हमारे राजनेताओं को ‘वोट बैंक’ के रूप में दिखते आ रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो संविधान के नियम ‘८०-जी’ के अन्तर्गत देश के समस्त धार्मिक संस्थाओं को ‘आयकर’ से छूट क्यों दी गयी है?
इस सन्दर्भ में देश के राजनीतिक दलों को भी छूट मिली है। क्या कारण है, देश के राजनीतिक दलों को चन्दा आदिक के रूप में प्राप्त धनराशि को आयकर से मुक्त किया गया है?
पिछले दो वर्षों में विभिन्न राजनीतिक दलों-द्वारा प्राप्त चन्दे की धनराशि पर विचार करें तो भारतीय जनता पार्टी को वर्ष २०१५-२०१६ में चन्दे से कुल ५७० करोड़ रुपये की राशि प्राप्ति हुई थी; वहीं वर्ष २०१६ में काँग्रेस ने चन्दे के रूप में २६१ करोड़ रुपये की राशि पायी थी। कमोबेस यही स्थिति समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की भी है। वही चन्दे की धनराशि वर्तमान में दोगुणी से भी अधिक पहुँच चुकी है। ऐसे में, सहज ही प्रश्न उठता है— इन सारे दलों की धनराशि को आयकर से क्यों मुक्त किया गया है? सारे नेता चन्दा का भरपूर दुरुपयोग करते हैं; आवास, पानी, बिजली, फोन, यात्रा, वाहन, अय्याशी आदिक की सुविधा निश्शुल्क लेते हैं और ‘कर’ (टैक्स) के नाम पर एक पैसा नहीं देते हैं।
यहीं पर यक्ष प्रश्न आ धमकता है— देश की आम जनता किसी भी प्रकार का ‘कर’ (टैक्स) क्यों दे? इन विषयों पर देश की शीर्षस्थ न्यायपालिका ‘उच्चतम न्यायालय’ के न्यायविद्-मण्डल को ‘स्वत: संज्ञान’ लेना चाहिए, ताकि देश की व्यवस्थापिका और कार्यपालिका को कभी न भूलनेवाली सीख मिल सके।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ८ सितम्बर, २०१८ ईसवी)