● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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एक–
आग ‘आग’ से कह रही, दु:ख से मत हो दूर।
सुख तो औरों के लिए, दु:ख जीना भरपूर।।
दो–
तिनका-तिनका जोड़कर, महल बनाया एक।
आधी घड़ी न सुख मिला, रहने लगे अनेक।।
तीन–
कष्ट मिटाओ लोक से, बन सुख का आधार।
अधरोँ पर मुसकान ला, गाओ जीवन-सार।।
चार–
सकल विश्व मे वेदना, माया-मोह न जोड़।
पूजा केवल कर्म है, जिसका कहीँ न तोड़।।
पाँच–
सुख के पीछे भीड़ है, यही जगत् का खेल।
केर-बेर से दूर रह, रखना सबसे मेल।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० अक्तूबर, २०२४ ईसवी।)