कटुता कण्टक-सा चुभे

एक–
चिन्ता-चिन्तन शब्द हैँ, शब्द बने अविराम।
शब्द-शब्द मन्थन करो, मानस हो अभिराम।।
दो–
शब्द-शब्द अश्लील है, शब्द बनाये श्लील।
शब्द समादरयुक्त है, हरण है करता शील।।
तीन–
लोचन आलोचन लगे, दृष्टिबोध है मर्म।
कटुता कण्टक-सा चुभे, औषध केवल कर्म।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ अक्तूबर, २०२४ ईसवी।)