योगी! तेरे शासन में

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

न बिजली है न पानी,
योगी का नहीं सानी।
जनघाती नीति कहती–
शासन है दुरभिमानी।
आँखें खोलो, जागो भी,
नहीं यहाँ है दाना-पानी।
शासन नहीं, दुश्शासन है,
आँख हो गयी है कानी।
तन लोभी, मन भी लोभी,
याद कराये सबकी नानी।
आँख का पानी मरा नहीं ‘गर,
भरवाना है उससे पानी।
‘योगी’ तो उसको हैं कहते,
तन-मन जिसका हो दानी।
ख़ून चूसता जन-जन देखो,
अगली बार मुँह की खानी।
नहीं सगा किसी का दिखता,
बाहर करने की सबने ठानी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ अक्तूबर, २०२० ईसवी।)