आइए! आत्म-परीक्षण करें

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

वर्ष का वर्तमान ‘अतीत’ होनेवाला है। सहजतापूर्वक समय-चक्र गतिमान है। हम सब का बहुत कुछ कभी न खुलनेवाली एक गठरी में बाँध कर रख दी गयी है, जिसे हम याद ही कर सकते हैं; किन्तु पा नहीं सकते। कृषकाय वर्षांग ‘वर्षान्त’ का अवसान समीप देख कर, हमारे कन्धे पर अपने हाथों से स्निग्ध स्पर्श करते हुए, हमारे-द्वारा जिये और भोगे गये प्रत्येक क्षण के मृदु और तिक्त कर्मों का प्रत्यक्षीकरण कर रहा है; इस विषय का अनुभव कराते हुए कि वर्ष का क्षण-क्षण अमूल्य है; समय के साथ विश्वासघात करोगे तो भयावह परिणाम को भोगने के लिए प्रस्तुत भी रहना पड़ेगा।

वक़्त तो हवा का एक झोंका है, जिसे चाह कर भी हम पकड़ नहीं सकते। हाँ, सदुपयोग कर सकते हैं। इससे पूर्व कि मृतप्राय वर्ष हमसे मोह-भंग कर ले; आइए! हम अपने अन्तरात्मा से प्रश्न करें— हमारा कर्म वर्षभर कितना नकारात्मक रहा और क्यों? क्या हम उन नकारात्मक स्थितियों से स्वयं को विलग नहीं कर सकते थे? उसके लिए हम किस हद तक उत्तरदायी रहे हैं ?
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३१ दिसम्बर, २०१९ ईसवी)