‘असिस्टेण्ट प्रोफेसर-परीक्षा’ के लिए प्रश्नपत्र बनानेवाले ‘लिए’, ‘मस्तिष्क’, ‘प्रस्तुतीकरण’, ‘प्रवृत्ति’, ‘वैयक्तिक’ आदिक शब्द नहीं लिख सके?.. !
- भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने प्रश्नपत्र बनानेवालों की योग्यता पर प्रश्न उठाया है ।
- डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने प्रश्नपत्रों में भाषा-व्याकरण और प्रश्न-सम्बन्धी सैकड़ों अशुद्धियाँ होने का चुनौतीपूर्ण दावा किया है ।
हाल में जितनी भी प्रतियोगी परीक्षाएँ हुई हैं, उनमें से कोई भी परीक्षा ऐसी नहीं रही, जिसके प्रश्नपत्र अशुद्धिरहित रहे हों। सच तो यह है कि अब ऐसा सिद्ध होता दिख रहा है कि सभी परीक्षाओं में ऐसी होड़ लग गयी है कि कौन-सा शिक्षा-आयोग कितनी अशुद्धियों से भरे प्रश्नपत्र बनवाकर परीक्षार्थियों को भ्रमित कर सकता है।
उसी क्रम में ‘उत्तरप्रदेश उच्चतर शिक्षा आयोग’, इलाहाबाद ने भी अपना नाम अंकित करा लिया है। स्मरणीय है कि १५ दिसम्बर, २०१८ ई० को उक्त आयोग की ओर से ‘असिस्टेण्ट प्रोफेसर’ की परीक्षा करायी गयी थी। ‘प्रथम भाग’ के अन्तर्गत अनिवार्य प्रश्नपत्र के रूप में ‘सामान्य ज्ञान’ का विषय था। इस विषय के प्रत्येक प्रश्न में वर्तनी, विरामचिह्न तथा प्रश्न की प्रस्तुति सन्दिग्ध है। उदाहरण के लिए पहले ही प्रश्न को समझा जा सकता है : सिन्धु की निम्नलिखित सहायक नदियों में कौन पाकिस्तान से होकर नहीं बहती है ? की जगह होगा : ‘सिन्धु की निम्नलिखित सहायक नदियों में से कौन-सी नदी पाकिस्तान से होकर नहीं बहती है?’ इसे शुद्ध और उपयुक्त प्रश्नशैली कहते हैं। दूसरे प्रश्न में ‘बृहतम’ की जगह ‘बृहत्तम’ ; तीसरे प्रश्न में ‘कौन-सा नगर’; चौथे प्रश्न में ‘वापस लौटो’ की जगह ‘लौटो’ होगा तथा ‘किसने दिया था’ का अँगरेजी-अनुवाद ‘हू हैड गिवेन’ होगा। पाँचवें प्रश्न के अन्त में ‘पूर्णविराम-चिह्न’ के स्थान पर ‘विवरणचिह्न'(:–) और छठे में ‘कौन-सा विद्रोह’ होगा। सातवें प्रश्न के (डी) विकल्प में ‘उपर्युक्त सभी’ की जगह ‘इनमें सभी’ होगा; क्योंकि अगल-बगल भी प्रश्न हैं। नौवें प्रश्न के अन्त में ‘निर्देशक-चिह्न (—) की जगह ‘विवरणचिह्न) लगेगा। प्रश्न दसवें में ‘किसमें’ के स्थान पर ‘कहाँ’ होगा। ग्यारहवें प्रश्न में मई २०१८ में कर्नाटक में कितनी विधानसभा सीट के लिये चुनाव हुआ? में पाँच प्रकार की अशुद्धियाँ हैं :– पहली; मई में ‘अल्पविरामचिह्न’ (,); दूसरी, विधानसभा की कितनी सीटों के; तीसरी, लिए; चौथी, ‘हुए’ तथा पाँचवीं, ‘थे’। इसी तरह से प्रश्न १९ में ‘विद्वानों में से’ होगा। प्रश्न २० में ‘बेहतर है’ के बाद ‘अल्पविरामचिह्न’ लगेगा और उसके बाद ‘जो’ प्रयुक्त होगा। प्रश्न २१ में ‘की गयी थी’ होगा, जो अँगरेज़ी में भी ग़लत है। प्रश्न २४ में तथ्य की ग़लती है; क्योंंकि ‘विनय सिद्धान्त’ की जगह ‘विलय-सिद्धान्त’ होगा। प्रश्न २७ के विकल्प (ए), (सी) तथा (डी) व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध हैं। प्रश्न २८ में ‘साक्षरता दर’ में ‘योजकचिह्न’ (-) लगेगा।
‘भाग दो’ के अन्तर्गत ‘मनोविज्ञान’ प्रश्नपत्र में अशुद्धियों की भरमार है। ‘मनोदौर्बलता’ की जगह ‘मनोदौर्बल्य’; ‘लिये’ की जगह ‘लिए’; ‘महत्व’ की जगह ‘महत्त्व’; ‘आंकलन’ और आंकने’ की जगह ‘आकलन’ और ‘आकने’; ‘चिहन’ की जगह ‘चिह्न’; ‘प्रस्तुतिकरण’ की जगह ‘प्रस्तुतीकरण’; ‘प्रवत्ति’ की जगह ‘प्रवृत्ति’; ‘विश्यसनीयता’ की जगह ‘विश्वसनीयता’ ; ‘वैदेक्तिक’ की जगह ‘वैयक्तिक’ होगा। ‘सान्निध्य’, ‘क्रिया’, ‘अनुक्रिया’,’सीखी गईं’,’उद्गार’,’सिद्धान्त’, ‘आक्रामकता’, ‘आवश्यकताएँ’, ‘थर्स्टन’ आदिक सैकड़ों शब्द प्रश्न बनानेवाले नहीं लिख सके हैं।इनके अतिरिक्त इन दोनों भागों के प्रश्नों में इतनी अशुद्धियाँ हैं कि अब एक ही उपाय बचता है; और वह यह कि इन प्रश्नों के तैयार करनेवालों को ‘लाइन हाज़िर’ कराकर, ‘आर्थिक दण्ड’ लगाते हुए, सदैव के लिए ‘कुपात्र’ घोषित कर देना चाहिए; साथ ही आयोग के सम्बन्धित समस्त अधिकारियों की कक्षा लगायी जानी चाहिए, अन्यथा यह गन्दगी एक दिन एक ‘घातक टीला’ का रूप ले सकती है।