— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
गुरु ‘गुरु’ ही है। जैसे ही कोई शिष्य यह विचार कर विद्या ग्रहण करता है कि वह अपने ‘गुरु’ की सिद्धि का अतिक्रमण कर स्वयं को सिद्ध करेगा, वैसे ही उसका चारित्रिक स्खलन आरम्भ होने लगता है और उसके आचरण की सभ्यता का विकारग्रस्त रूप दिखने लगता है। गुरु का गौरव परमुखापेक्षित नहीं रहता। वह प्रवहमान (‘प्रवाहमान’ अशुद्ध है।) है; अपना दिव्य प्रसाद वितरित करता रहता है तथा गुरु के साथ समय-सत्य दृष्टिबोध यात्रा करता रहता है।
उचित-अनुचित का भान करते हुए, गुरु का शास्त्रीय पक्ष उसका ‘कवच-कुण्डल’ के रूप में उसके पास संरक्षित-सुरक्षित रहता है। द्रोणाचार्य ने अर्जुन को अपना परम शिष्य मानते हुए भी सम्पूर्ण विद्याज्ञान नहीं कराया था। यही कारण था कि द्रोणाचार्य को पराजित करने में असफल अर्जुन को ‘छल’ का सहारा लेना पड़ा था।
मेरे समस्त शिष्यगण! गुरु के प्रति ‘भक्तिभाव’ के साथ प्रस्तुत होने की ‘कला’ स्वयं में विकसित करो। जो गुरु बाहर से अत्यन्त कठोर होता है, वह भीतर से अतिशय नमनशील होता है। ‘नारियल’ का स्वभाव तुम सभी ने देखा, समझा तथा अनुभव किया होगा।
कोई भी वास्तविक गुरु क्यों कठोर स्वभाव धारण करता है, इस विषय को समझना होगा।
गुरु प्रतिपल उस प्रकृति से ग्रहण करता है, जो अपना सब कुछ लुटाना जानती है। यही कारण है कि गुरु की ग्रहणशीलता में प्रकृति का ‘उन्मुक्त’ स्वभाव अन्तर्निहित रहता है।
वास्तविक गुरु की शिष्य-शिष्याएँ आत्मिक, बौद्धिक तथा मानसिक संवृद्धि के लिए अवसर पाती हैं और सहज रहकर अभ्युदय-पथ पर डग भरती हैं तो उस गुरु का वक्षप्रान्त चतुर्गुणित हो जाता है, जो उसकी ‘वास्तविक गुरुदक्षिणा’ होती है।
मेरे शिष्या-शिष्य आज देश के कोने-कोने में अपनी कीर्तिध्वजा को लहरा रहे हैं, जिनमें उनकी कर्त्तव्यपरायणता की सुगन्धि का सर्वत्र अनुभव हो रहा है। निस्सन्देह, वे मेरे शिष्या-शिष्य नहीं हैं और न ही विद्यार्थी हैं, जो उच्चपदस्थ हैं और अपने कदाचार और दुष्कर्मों से समाज को संदूषित करते आ रहे हैं अथवा वे जो सत्यनिष्ठ हैं; किन्तु अपने पद के कारण अहम्मन्य और अनुशासनहीन दिख रहे हैं।
आज मैं अपने उन लाखों दृश्य-अदृश्य शिष्याशिष्यवृन्द के उन्नत भविष्य की कामना करता हूँ, जो अपनी पद-प्रतिष्ठा कर रहे हैं और जो अध्यवसायिकता के साथ विद्यार्थी-जीवन-यापन कर रहे हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ जुलाई, २०२१ ईसवी।)