परीक्षा-अनुशासन की उपेक्षा का परिणाम– ६९ हज़ार अभ्यर्थियों के भविष्य पर लगा ग्रहण?

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

सभी को स्मरण होना चाहिए कि बेसिक शिक्षा परिषद् के अन्तर्गत आनेवाली प्राथमिक शालाओं में सहायक अध्यापक के लिए जो परीक्षाएँ आयोजित करायी गयी थीं, उनके प्रश्नपत्रों में ‘बचकाने’ स्तर पर जो-जो अशुद्धियाँ की गयी थीं, उन पर मैंने सविस्तार लिखा था और जिसे देश के सर्वाधिक प्रसारवाले दैनिक समाचारपत्र ‘दैनिक जागरण’ के उत्तरप्रदेश के समस्त संस्करणों में प्राथमिकता के साथ प्रकाशित भी किया गया था। खेद है, उसका संज्ञान न तो उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री, न बेसिक शिक्षामन्त्री, न बेसिक शिक्षा परिषद् के अधिकारीगण तथा न तो उक्त परिषद् की विशेषज्ञ-समिति के सदस्यों ने किया था। अब परिणाम और प्रभाव सामने है, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ-पीठ ने ‘स्थगनादेश’ कर, विषय को ‘विशेषज्ञ-समिति’ के पास भेजने का आदेश किया है। विवादास्पद विन्दुओं पर सांगोपांग विचार और निर्विवाद निर्णय करने के बाद ही नियुक्ति-प्रक्रियाएँ आरम्भ की जातीं तो श्रेयस्कर रहता। विगत डेढ़ वर्षों से ठहरी नियुक्ति की समस्त प्रक्रियाएँ अकस्मात् इतनी तीव्र गति से आरम्भ हो चुकी थी कि निस्सन्देह, लग रहा था कि चयनित समस्त अभ्यर्थी जून-माह में ही पूर्ण रूप से नियुक्त कर लिये जायेंगे; किन्तु उत्तरप्रदेश-शासन, बेसिक शिक्षा परिषद् के भ्रष्ट अधिकारीगण तथा परीक्षा विशेषज्ञ-समिति के अयोग्य और कुपात्र सदस्य के कुत्सित कृत्यों के कारण उत्तरप्रदेश के ७५ जनपदों (ज़िलों) में आज (३ जून) से आरम्भ हो चुकी ‘कौंसिलिंग’ को भी अभ्यर्थियों से उनके मूल शैक्षिक प्रमाणपत्र आदिक लेकर स्थगित करनी ही पड़ी है। ऐसे में यह भी आशंका है, कहीं बेसिक शिक्षा परिषद् के अधिकारीगण आगे की प्रक्रियाओं में कोई और खेल न कर दें ।

यहाँ प्रथम दृष्टया उत्तरप्रदेश-शासन पूर्णतः दोषी है। जब यह तथ्य वर्षों से सार्वजनिक होता आ रहा है कि बेसिक शिक्षा परिषद् के अधिकारीगण महाभ्रष्ट हैं और अधिकतर उनके वे ही चमचे प्रश्नपत्र तैयार करते आ रहे हैं, जो नितान्त अयोग्य हैं; परीक्षा से पूर्व प्रश्नपत्रों का क्रय-विक्रय किया जाता रहा है तब उत्तरप्रदेश-शासन ने सतर्कता क्यों नहीं बरती थी ? उक्त असत्यनिष्ठ और कर्त्तव्यविहीन अधिकारियों और सदस्यों के विरुद्ध शासन ने कौन सा न्यायिक क़दम उठाया था ? शासन और परिषद् के अधिकारियों को अपने पर इतना भरोसा था कि वे नियुक्ति करा ले जायेंगे तो उनके अधिवक्तागण से न्यायालय में शासन की ओर से पैरवी करते समय कहाँ और कैसे चूक हो गयी थी, ये प्रश्न सर्वाधिक महत्त्व के हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उक्त सारा परिदृश्य उत्तरप्रदेश-शासन की उस कूटनीति का परिणाम और प्रभाव है, जिसके अन्तर्गत शासन यह सन्देश दे सके– हमने तो आदेश कर दिया था; परन्तु बीच में न्यायालय का हस्तक्षेप हो गया था।

बहरहाल, तस्वीर साफ़ हो चुकी है कि उक्त प्रकरण को लटकाये रहो । कौंसिलिंग के इस प्रथम चरण में आज सुदूर जनपदों से बड़ी संख्या में महिलाओं को बुलाया गया था । वे कितनी कठिनाइयों के साथ गन्तव्य तक पहुँची होंगी, इसका हम अनुभव भी नहीं कर सकते । सभी के चेहरे पर विजयश्री की आभा दिख रही थी, जो क्षणिक थी । अब सभी कान्तिविहीन-सी दिख रही हैं; लौट आना ही उनकी नियति बन चुकी है । उत्तरप्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद् की मंशा क्या थी, यह भी सुस्पष्ट हो चुका है ।

परिषद् की अयोग्यता और अनियमितता का दुष्परिणाम योग्य और नियमित अभ्यर्थियों को क्यों मिले, उत्तरप्रदेश-शासन ने यदि इस विषय पर पारदर्शिता के साथ विचार नहीं किया तो उसे उसका भुगतान करना ही पड़ेगा ।

अब एकमात्र उपाय यह है कि बेसिक शिक्षामन्त्री चार प्रश्नों के उत्तरों का स्वस्थ परीक्षण सुयोग्य ‘विशेषज्ञ-समिति’ से करा कर, निर्विवाद परिणाम साक्ष्य-सहित न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत करे, ताकि एक-दो अंकों से पीछे चल रहे पैंतीस याचिकाकर्त्ताओं को भी सन्तोष-लाभ मिल सके ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ जून, २०२० ईसवी)