जुग-जुग जीय बकलोल बबुआ आ कारिख पोतवाऊ मटिलगनी

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


इहे त भोजपूरी ह; तनी कनखी मारि के आ छिंउकी काटि के एकरा के पढ़ीं सभे, ना त गतर-गतर गुजियाये लागी आ सगरो देहिया चुनचुनाये लागी:——-
बे, हो मटिलगना के का कहीं — रात-बेरात ना जाने केने उधियाइल रह ला; मुँह फुकावत रह ला– कमासुत लेखा। हा हउ छउँड़ी के मत पूछ– ए घरी बाड़ा अगराइल रह तीया। बुझा ता की ओकरो कवनो हाँड़ी-कूँड़ा मिलि गइल बा। बबुआ त कवनो गती के ना भइले; अब इहो तहार नाँव डुबाई के, जिला हेलावन बनि जइहें। अब इ भछि के का करबू : जनले रहतीं त सउरिये में नून दे दिहतीं। त काहे ना दे दिहलू।
आ हो पाड़ा के देख! अन्हरिये में बकरी के दूह ता। ना बुझ ल, अब ओकर मती मराई गइल बा — रतिया के ना जाने का-का बरात रह ला—- कबो कहला— मोदी हमारा के अब नोकरी दीहें आ कबो कहला ‘दीपिकवा’ (दीपिका पादुकोण) बोलावतिया; बमई (बम्बई) जाइब आ ‘पदमावत’ फिलिमिया में एगो पारट करे के लीला भंसलिया से जोर लगवाइब। ए बकलोल दुलहा के पगलवन के फउज में भरती करा दिहल नीक रही। आ न त जोर मारत करणी सेना में घुसाई देबे के बा।
ए बकचोन्हर के मोदी कटहर दीहें। उनकर त पेट भरते नइखे। जब देख तब, बिदेसे में घुसल रहता। एसे ए ससुर के मोदी भरी सूप सुथनी देई के ओकरा के निकियावे के कहिंहे। ओ सार पियाजु छीले के कहि द, लहसुन के निकियावे लागी।
ऊ बकलोल दुलहा दीपिकवा के पजरी गइले कि रनबीरवा उनकर ककन छोड़ावे लागी; एकर गतर-गतर नोचि लिही।
सब काम-धाम छोड़ी के हउ ‘जुगीनिया’ के आगे-पाछे फराकी ठोके के बहाने मडराइल रह ला। आ उहो भहरौनो एकरा के परिकवले रहतीया। अब लागता की ओहू भछनो के हेठा से ऊपर तक फोर-फारि के अकोर कई दीहल जाऊ। ना नौ मन तेल होखी ना कुलछनो नचिहें।
एगो भतार त सँभार ना पइहें, आ बन तारी बावन भतरो। जुग-जमाना केतना करियाह चलत आवता। आ इ बाड़ी की इसटाइल मारि-मारि के, मारि के सोगहग बिस सुन्दरी बने चाह तारी। कुकुर लेखा मुँहि बा आ बिलारी लेखा आँखि चमकावेली; आ ओकरा ऊपर ई की छतवा पर जाई के टोल-महाला के आपन थोबड़ा देखावत रहली। आ जेतना फालतू फण्ड के लइका रहलन स, सब गोड़ा हो बबुनी के सीसा चमकावलन स। अइसन बुझा ला कि कवनो नुमाईस लागल बा। एतने ना ऊ बबुनी दाँति चियारि के अइसे हँसली कि बुझाला मोहनजोदड़ो के खोदाई में पावल गइल असभ (असभ्य) जुग के कवनो नमूना हई।
अब का-का कहीं, कहत-सुनावत बेराम पड़ि जाईब। एसे नीमन इ बा कि तुहूँ सुत आ हम्हूँ सूतीं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २२ जनवरी, २०१८ ई०)