एक शब्द-चित्र

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय – 


वह मेरे पार्श्व में बैठी थी। मैं अपलक उसे निहार रहा था। राजहंस-सा गोरा, द्रुत-विलम्बित छन्द-सी गति, अभिधावाणी, उपनागरिकावृत्ति-सी प्रकृति, प्रसाद गुण-सा शील, निर्दोष, कान्तिमान मुखमण्डल पर क्रीड़ा करता शृंगार-रस, अंग-प्रत्यंग से फूटता शब्दालंकार– ये सब मिलकर उसे रस, छन्द, वृत्ति तथा अलंकारपूर्ण कविता बना रहे थे।


(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३० जनवरी, २०१८ ई०)