महेन्द्र महर्षि, वरिष्ठ प्रसारण अधिकारी दिल्ली दूरदर्शन (दुबई प्रवास के दौरान)-
वक़्त तो तय नहीं है । लेकिन पिछले कुछ दिनों से दिन के पहले पहर में इस बेंच पर बैठ कर सूक्ष्म व्यायाम करने हम नियमित तौर पर आते ही हैं । इर्द-गिर्द के पेड़ों-झाड़ियों से हमारा एक अनबोला परिचय हो चला है । एक नया रिश्ता सा भी हो ही गया है । जब कुछ तेज़ हवा होती है तो पीपल के पेड़ों की पत्तियों के सुमधुर संगीत की सरसराहट चारों ओर से उठने लगती है । मेरे बैठने की बेंच के ऊपर के पेड़ पर लगीं कुछ सूखी, कुछ अधसूखी सी, मोटी फलियाँ भी अलग सा शोर मचाती हैं । कभी कोई एक सूखी फली, कड़ से फ़र्श पर गिरकर अपने वजूद से कट कर गिरने का अहसास कराती है । जब मैं यह सब महसूस कर रहा होता हूँ तो एक नीली पीली वर्दी वाला आदमी अपनी साईकिल पर वहीं सामने से लगभग ठीक इसी दौरान रोज़ निकलता है । मैं नजरों से उसे पहचानने लग गया हूँ, वैसे ही जैसे वहाँ के पेड़ों के झुरमुट और झाड़ियों को या फिर एक पेड़ से दूसरे पर अपने पंख फड़फड़ाते पंछियों और उनकी चीं-चीं, चौं-चौं को ।
ये सभी एक वातावरण बुनते हैं जिसमें मैं भी अब कुछ वक़्त से शामिल हो रहा हूं । मेरा कंठ और नासिका स्पन्दित हो जाता है जैसे गायत्री मन्त्र का ऊँ (ओंकार) या श्वांस के दोलन की ध्वनि । रोज़ वहाँ से गुज़रने वाले उस वर्दीधारी व्यक्ति की साईकिल पैडल-पहिए की आवाज़ भी इस माहौल का एक पुर्ज़ा जैसी लगने लगी है । मन में एक सवाल अचानक स्वयं से पूछने के लिए उभरने लगा है कि इस साईकिल वाले आदमी को मैंने बागबां क्यों मानना शुरू कर दिया है ? हमारा कोई संवाद कभी हुआ नहीं , हाँ एक आध बार नज़रें ज़रूर मिलीं है । जबाब अपने से ही दे लेता हूँ कि यह माली है क्योंकि इसकी साईकिल के हैंडिल पर लटकी टोकरी में एक कैंची उसके रंगीन हरे दस्तों के बाहर दिखने के कारण अपना अहसास कराती है । बस, इसलिए मैंने उसे बागवां मान लिया है । यह कोई लॉजिकल कारण नहीं है मगर मेरा मन सहमत है तो वह व्यक्ति मेरे लिए निस्सन्देह: न भी हो तो ससंदेह ही सही, कह दूँ मुझे माली जैसा लगता है । हम शक की बिनाह पर भी कई बार घोर ग़लत कर जाते हैं क्योंकि हम शक को शक नहीं मानते, बस पक्का मानने लग जाते हैं क्योंकि हम अपने शक को पूरा होते देखने की मंशा रखते हैं । अगर ऐसा न होता तो पहलू खान न मरता । ख़ैर हम बागबां के वास्तविक सत्य पर शक से परे चलें । इसी तरह कुछ सुबह निकल गईं । एक दिन वही साईकिल वाला अपने हाथ में बल्लम जैसी एक लम्बी सी चीज़ लिए दूसरे हाथ से हैंडिल पकड़े साईकिल पर आया । मैं जिस बेंच पर बैठा था उसने वहीं समीप के एक पेड़ के सहारे अपनी साईकिल टिका दी । मैंने देखा उसका वह लम्बा छड़ बल्लम जैसा एक हथियार था जिसके उपरी सिरे पर एक चमचमाती धारदार आरी लगी थी । मुझे यह तय करने में देर नहीं लगी कि यह पेड़ों की डाली काटने की चीज़ है । ये भी कि यह वही है जो मैं इसे इतने दिन से मन ही मन मान रहा था । यानि यह माली भी है और बागवां भी, जो छँटाई करता है ।
पेड़ों की सूखी टहनियाँ काटी जाती रही हैं । वे ख़ूबसूरती बिगाड़तीं हैं इसलिए भी काटी ही जातीं है और जलावन की लकड़ी के तौर पर काम में भी ली जाती हैं । मैं हर रोज़ की तरह अपने व्यायाम में लगा था कि इसी बीच नज़दीक के किसी पेड़ की बड़ी डाल के चिड़चिड़ा कर नीचे गिरने की आवाज़ ने मेरा ध्यान खींचा । देखता हूँ कि पीपल के पेड़ की एक बड़ी सी मोटी शाखा अधकटी नीचे लटक गई है और बल्लम वाला वही माली उसे काटने में लगा है । क्षण भर में धम-झम, धड़ाम करती पीपल की वह विशाल डाल ज़मीन पर आ गिरी । न जाने क्यों, पर मैं अंदर तक सिहर गया । लगा ! क्या बीती होगी उस पीपल पर जिसकी क्षणों पहले लहलहाती शोर मचाती पत्तियाँ उसकी साँस-साँस में शामिल थीं ? पेड़ तो मस्त था, हर किसी को कुछ और नहीं तो निश्चित ही प्राणवायु तो रात और दिन दे रहा था । मगर फिर भी अपनी डाल यों ही कटा बैठा । क्या इसलिए कि वह इंसानी बग़ीचे का पेड़ है जिसे तराशा ही जाएगा ताकि बग़ीचा ख़ूबसूरत लगे ? अगर किसी घर की खिड़की उसकी ओट में आ रही हो तो भी उसे कट जाना है । पेड़ नहीं, वह पुतला है जिसे हथियारों के दम पर घेरे में ले, जमींदोज किया जा सकता है । इसमें कितना शक और कितना सच ? शायद ही कभी पीछे के सच को वक़्त बता पाएगा ।
बस्तियों के बागबां आरी लिए रहते हैं, जंगल के लकड़हारे कुल्हाड़ी । मक़सद अलग-अलग, पर कटता तो पेड़ ही है , कहीं डाल से तो कहीं तने से । यह छँटाई है जिसका मक़सद बात-बात में वक़्त के साथ-साथ उलटते-पुलटते अपना उल्लू सीधा करने के लिए बागबां और लकड़हारे अपनी आरी, कुल्हाड़ी से मन चाही तराश करते हैं । आज कल एक अलग क़िस्म की बालों की कटिंग का फ़ैशन ज़ोरों पर है । सिर के बाल ऐसे काटे जा रहे हैं कि वे किसी टापू के बीच में उगा जंगल जैसे लगते हैं । जिसके किनारों को कभी लगी आग ने सफ़ाचट कर दिया था । अब पता नहीं नया फ़ैशन कब आएगा कि सारे सिर पर बाल अच्छे दिनों की आस की तरह फिर बढ़ जाएँगे । बहरहाल कहीं-कहीं ही जंगल अछूता बचा रह गया है बाक़ी तो सब सफ़ाचट मैदान है । मित्रों ! वक़्त तो सदा ही उम्मीद का ग़ुलाम रहा था, सो आज भी है । डालें तराशी ही जाती रहेंगी । कटना-उगना तो नियति है ।