मन सहकल बनि गइली तहार बबुनी

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


सब केहू से अझुरइली तहार बबुनी,
घर-अँगना भहरइली तहार बबुनी।
मांग पोछाते उ नवका संंघतिया धइली,
मुँह करिखा लगइली तहार बबुनी।
अइसन कइली पढ़इया सहरिया में ऊ,
बावन भतरी कहइली तहार बबुनी।
कही के कोचिंग निकलेली आ जा ली कहीं,
इजतिया सगरे उघरली तहार बबुनी।
तहरा खाये के जुरे ना एगो बेरिया,
बर्गर-सैण्डविच सरकौली तहार बबुनी।
ढील काहें के देहल हर बतिया में तू?
मन सहकल बनि गइली तहार बबुनी।
बतिया हमार पढ़ि के देखावली थपरा,
अपना भीतरा ना झँकली तहार बबुनी।
इहे कलजुग हवे जनि झँखिह अब तू,
जिनगी भर ई रोवइहें अब तहार बबुनी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १४ फरवरी, २०१८ ई०)