अश्रुधार जब बहता होगा

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

अश्रुधार जब बहता होगा,गालों से कुछ कहता होगा।

आँखों से बिछुड़न के कारण,बड़ा दर्द वो सहता होगा।।
हृदय प्रकम्पित,अवरुद्ध गला, रग में होती होगी सिहरन,
क्या जैसे यह टपक रहा, वैसे  ही होगी  इसकी विरहन?
मनोभाव उद्वेलित होगा, या  फिर  कोई सुन्दर एहसास,
उर के उठापटक से शायद! भाव नीर सम बहता होगा।
भाव क्षीणता है कारण, या फिर होगा साहस का भार,
बुलबुले -सा सोच- सोच, यूँ छोड़ रहा नयनों का द्वार।
छल-कपट के तीक्ष्ण शरों से ,बिद्ध पड़ा आहत होकर,
भावों की गहराई में जा के, यह भी मंथन करता होगा।
यह ख़ालिस नीर नहीं प्रियवर, भावों का सम्पुट होगा,
यूँ ही नहीं प्रगल्भित होगा, सुख या दुःख का पुट होगा।
मिथ्या ही न उमड़ पड़ेगा, च्युत होने का कारण होगा,
कभी प्रेम तो कभी विरह के ,अक़्सर गीत ये गाता होगा।