महेन्द्र नाथ महर्षि – गुडगांव
एक वाक़या है। बड़ी कार बनाने वाली कम्पनी के एक माहिर इंजीनियर ने ख़ूब सूझबूझ से एक नायाब कार डिज़ाइन की। कार में सैंकड़ों ऐसे प्रावधान किए जिससे कार इतनी सुविधाजनक बन गई कि उसमें रहना घर जैसा और सफ़र करना हवाई यात्रा से कुछ कम नहीं था। कार कम्पनी के डायरेक्टरों ने कार बनाने वाले इंजीनियर की तारीफ़ ही नहीं की कार में घूमने की इच्छा भी जताई। तारीफ़ पाकर इंजीनियर ‘फूला -फूला ‘ नहीं समाया। कार में पूरा पैट्रोल भरा गया और सभी सवारी करने के लिए आरामदायक सीटों पर बैठ गए। इंजीनियर ने ख़ुद ही ड्राइवर सीट पर बैठ कार चलाना तय किया। पर जब कार फ़ैक्ट्री शेड के दरवाज़े पर पहुँची तो लगा कि उसमें एक चूक हो गई है। उसकी उंचाई दरवाज़े की मानक इकाई से ज़रा ज़्यादा रखी गई है। इंजीनियर का मन बुझ गया। वह पछताने लगा कि इतनी छोटी सी चूक करके उसने अपनी लापरवाही का नमूना पेश किया है। लेकिन कार की सड़क पर परीक्षा तो अभी बाक़ी थी। मगर वह तो तभी होगा जब कार पहले सड़क पर पहुँचे। एक सिविल इंजीनियर ने दरवाज़े को उपर से थोड़ा काटने का सुझाव दिया। दूसरा सुझाव कार पेंटर ने दिया कि छत पर रगड लगाते हुए कार को बाहर निकाल लेने के बाद उस पर पेंट फिर करा जा सकता है। मगर इंजीनियर को यह सब मंज़ूर न था। उसे अपने मालिक और अन्य अधिकारियों से भी शर्म आ रही थी। इस सारी चर्चा को वहीं पास खड़ा दरबान देख सुन रहा था। वह छोटा कर्मचारी था। बड़े लोगों के बीच में बोले या नहीं , यही सोचता रहा। मगर जब सभी लोग असहाय दिखे तो उसने एक छोटे कर्मचारी के कान में कहा कि उसके पास एक तरकीब है।
उसे फुसफुसाते फैक्ट्री मालिक ने देख लिया। उसे अपने पास बुलाकर कहा कि वो जो करना चाहता है निडर होकर करे। वह मालिक की बात सुन एक तिनका उठा कर कार के पास पहुँचा और टायरों की हवा निकालने लगा। क्षण भर में कार दो इंच नीची हो गई। सभी लोग उसकी अक़्ल के क़ायल हो ताली बजा कर उसकी तारीफ़ करने लगे। मालिक ने उसके लिए ईनाम की घोषणा कर दी।
जब जीवन पर नज़र डालेंगे तो महसूस करेंगें कि हम ही नहीं हमारे इर्दगिर्द मामूली से दिखने वाले लोग कहीं ज़्यादा व्यवहारिक सूझबूझ रखते हैं।
समस्याओं को सदा विशेषज्ञ के नज़रिये से ही नहीं देखना ,सोचना चाहिए। समय विशेष पर बड़ी समस्याओं के सरल उपाय भी निकल सकते हैं। जीवन के संग्राम की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यहाँ सफलता पाने के लिए सरल सोच के साथ साधारण जीवन अपनाना बहुत सुकून दे सकता है। हमें ईश्वर प्रदत्त एक प्रसन्नचित आत्मा वरदान रूप में मिली है मगर हम उसे कम ही पनपने देते हैं। हमारे दम्भ और आकाश छूती आकांक्षाएँ हमें फुलाए रखती हैं, चैन नहीं लेने देतीं। इस ग़ुब्बारे से फुस्स करके हवा निकाल देना बहुत कारगर होता है। जब हमारी निराशा, ग़ुस्सा , अहंकार से भरे टायर का वाल्व पूरा न भी सही थोड़ा थोड़ा भी पिचका दिया जाता है तो जीवन में पैदा हुआ कनफ्यूजन मिट जाता है।
जीवन “ ऊँचाईयों को समयानुकूल घटा लेने के समन्वय “ की कला है। अपना रुख़ पलटिए ताकि जीवन सरस , सुंदर और तनाव मुक्त हो सके। द्वेश से अधिक कारगर सहयोग होता है। इसका व्यवहारिक पक्ष हमारे देश के राजनीतिक दलों से ज़्यादा कौन समझा सकता है। सपा+बसपा, ममता+ शरद , केजरीवाल + कांग्रेस और न जाने कौन कौन समयानुकूल अपने टायर फुस्स कर कितनी ही चमचमाती मोटरों को फ़ैक्टरी से बाहर अंदर करते रहे हैं। ये सब ‘बडे’ लोग हैं। मामूली लोगों के तो हाथ भी कुछ नहीं आता तो फिर फूले फूले और बौराये से क्यों घूमें ? गर्दन उपर और क़द नीचे में कोई नुक़सान नहीं होता। जीवन खूबसूरत है। हर क्षण का आनन्द लें। मौसम बदलता रहता है ,स्थितियाँ भी कभी एक सी नहीं रहतीं। साथ-सहयोग से रहना , ख़ुश रहना जानें। यहां आते वक्त कुछ लेकर नहीं आए थे मगर छोड कर जा सकते हैं। स्वाभिमान तो साथ ही मिट जाएगा लेकिन सम्मान पीछे से भी थपथपाता रहेगा। यादों मे गुनगुनाता – गुदगुदाता रहेगा।