चिन्तन- जो पढ़े सो मूरख, न पढ़े महामूरख

अनन्तगामी हो चुके भारत के व्यतीत राष्ट्रपति अबुल पाकिर जैनुलआब्दीन साहब का एक विचार रेडियो समाचारों के ठीक पहले सुनता हूँ- “ यदि लोग मुझे अच्छे शिक्षक के रूप में याद रखेंगे तो मेरे लिए यह बड़े गर्व की बात होगी । “यह सुनकर मुझे अपने शिक्षक बनने के महादुर्भाग्य पर अब शुष्क अश्रुस्रवण हर देर रात तक करना पड़ता है । सरकारी बेसिक शिक्षक के रूप में इतनी दुर्दशा कि- हर दिन २० से ३० किलोग्राम भार साइकिल पर ढोना पड़ता है। जूते तक लदवा दिये, और गैस सिलेन्डर रह गया था, उसका भी अब कड़ाई से पालन का आदेश जारी हो गया है । एक पर एक बढ़ते जाते शिक्षणेत्तर दायित्वों से जीवन के शेष दिन नारकीय बन गये हैं, जो ओर छोर पारावार हीन हो चले हैं ।विद्यालय का सारा समय बच्चों के लिए, और बच्चे हैं कि बिना पढ़े ही पास होने की राह पर अविराम चलायमान है । बच्चों की शिक्षा पर ग्रामीण माता पिता की कोई जिम्मेदारी ही तय नही है । शासन प्रशासन में बैठे भाग्य विधातागण हरदिन नये-नये आदेशानुदेशों को कड़ी कार्यवाही के साथ मन और ह्रदय पर चलने वाली चाबुक की मार का अनुभव कराते हुये प्रेषित करते रहते हैं । उनको किसी की दशा- कुदशा पर क्या विचार कि कोई गम्भीर रोग से ग्रसित है, या कोई शिक्षिका देश के असुरक्षित वातावरण में अभी अविवाहित अवस्था में है। देश के प्रत्येक नागरिक का शिक्षित व स्वस्थ होना परमावश्यक है, पर देश के धन पर डकैती डालने वाले लोग तो लगभग सभी सुशिक्षित ही हैं । जो कार्य शासक प्रशासक स्वयं न कर पायें वह बलात् शिक्षकों के सिर थोप दें और शिक्षक कहीं सिर मुँड़वा रहे हैं, कहीं बुद्धि शुद्धि हवन कर रहे हैं। अंग्रेजियत का ऐसा भूत सवार हो चला है कि देश के भावी नागरिक सही ढंग से मातृभाषा लिखना तो क्या बोल भी नहीं पाएंगे । तब सचमुच हमारा भारत महान बनेगा उनकी दृष्टि में । भारत के हे अनेकनामी ईश्वर ! तू क्यों मौन दृष्टा है? देश के अनादर्शी सिकन्दर आगामी अतीत के पृष्ठों पर अपने नाम को महान बनाने में हर प्रकार से प्रयासरत हैं । तेरी उन पर यदि ऐसी ही अभिमति रही तो तुझे अभिशाप व अभद्र अपशब्दों से अलंकृत करने को शीघ्र ही मिलूँगा ।


अवधेश कुमार शुक्ल मूरख ह्रदय अप्रैल फूल-डे, २०१८