एक अभिव्यक्ति : मेरे सिर पर तना अम्बर, मुझे धरती पे रहने दो

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद)

चलने दो नियति का चाबुक,
मुझे निज  कर्म   करने   दो।
मेरे   हिय  में  चला    खंज़र,
मुझे  तुम   धैर्य  धरने    दो।
कोई ना-क़ाबिल कहे मुझको,
उसके आँखों की परख होगी।
मेरे   सिर     पर   तना अम्बर,
मुझे    धरती     पे   रहने दो।
जब नटवर लाल हो मालिक,
ये   नाटक    और  चलने दो।
ये जीवन   है    विकट हाला,
मुझे    कुछ    और  पीने दो।
तमन्ना है  मेरी    इबादत  की,
इजाज़त    और  मिलने  दो।
शराफ़त    शौक    था   मेरा,
मगर अदावत और बढ़ने दो।
मुझे  ज़न्नत ही  नशीं   होगा,
उसे   तुम   कफ़न सिलने दो।
उस    मग़रूर    को     यारा,
जनाज़ा   शौक   से बुनने दो।
उसे दी  हर  दरद की मुआफ़ी,
उसे     भी    मरद   बनने दो।