अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में दशकों से ‘ज़िन्ना’ का चित्र लगा हुआ है; इस सच को अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी, स्व० प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज तथा कई हिन्दूवादी नेता भी जानते थे; परन्तु किसी ने आपत्ति नहीं की थी। वर्तमान केन्द्रशासन चलानेवाले ठीकेदारों के प्रमुख नरेन्द्र मोदी भी जानते थे। ऐसे में, जिन्ना के चित्र हटाने की बात को लेकर उक्त विश्वविद्यालय का पठन-पाठन इससे पहले क्यों नहीं अवरुद्ध किया गया था?
ज़िन्ना के चित्र का विरोध करनेवालों ने तो ‘अहिंसा के पुजारी’ अपने राष्ट्रपिता, बापू महात्मा गांधी की प्रतिमा को ध्वस्त किया था; उनके हत्यारे नाथूराम गोड्से को गले लगा रखा है; डॉ० भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा को ‘भगवा’ रंग में रँगकर अपनी बौद्धिक सम्पदा बना डाली है। इतना ही नहीं, स्थान-स्थान पर अम्बेडकर की प्रतिमाओं को तोड़ा गया था। अफ़सोस! इतना सब होने के बाद भी उनके मुखिया ने पिछले दिनों दिल्ली में अम्बेडकर मेमोरियल भवन का उद्घाटन करते हुए, असत्य वाचन किया था :– मैं तो बाबा साहेब अम्बेडकर जी की प्रेरणा से प्रधान मन्त्री बना हूँ। मोदी को इस प्रेरणावाली बात अब याद आयी है। इससे पूर्व प्रधान मन्त्री बनने के बाद एक बार भी उन्होंने इस महा सत्य/,महा असत्य का कभी उद्घाटन तक नहीं किया था। इससे यह मुहाविरा चरितार्थ होने की स्थिति में है :– दाल में काला है अथवा समूची दाल ही काली है।
देश के जनसामान्य को न ‘ज़िन्ना’ से लेना-देना है और न ही अम्बेडकर से कोई सरोकार है; चैन से जनमानस को जीने दो। नौटंकी करने के लिए सबसे मुफ़ीद जगह ‘संसद्’ है, जहाँ तुम सबका नंगा नाच देश की जनता देखती आ रही है।
देश के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी जिस तिथि को बिन-बुलाये मेहमान बनकर पाकिस्तान गये थे और उसके बाद जिस तरह से पाकिस्तान की ओर से प्रतिक्रिया मिली थी, वह समूचे देश के लिए ‘लज्जा’ की बात थी; तब स्वाभिमान मर गया था?
प्रथम दृष्टि में ‘ज़िन्ना’ के चित्र का प्रकरण उठाकर विरोध करनेवाले मात्र तथाकथित सरकारी हिन्दुत्व की आग को भड़काते हुए, उसे हवा दे रहे हैं। उस आग में वे निकम्मे बच जायेंगे, झुलसेगी, देश की जनता।
भ्रष्टाचार, महँगाई, बेरोज़गारी, किसान-सन्तोष, सीमा पर जवानों की हत्याएँ, शिक्षित और अर्हता-प्राप्त, न्यायालय-द्वारा आदेशित बेरोज़गारों को नौकरी देने, पेट्रोल की महँगाई, नोटपरिवर्त्तन (नोटबन्दी) और जी०एस०टी०-असफलता, ज़ुम्लेबाज़ों से आक्रोशित जनता, प्रत्येक क्षेत्र में असफलता आदिक कारणों से ध्यान बँटाने के लिए ‘ज़िन्ना के भूत’ से राष्ट्रवादी देश को भयभीत करने का असफल प्रयास किया जा रहा है।
देश के जनमानस को चाहिए कि वह ऐसे दन्दफन्दियों और लफड़ेबाजों की बातों में न आये; क्योंकि उन्माद की वैसी स्थिति में मानव-सभ्यता पराजित होती है; जनसामान्य को क्षति पहुँचती है; उकसानेवाले साफ़ बच निकलते हैं; इसलिए विवेक का आश्रय लीजिए और आत्म उत्थान के लिए प्रयासरत हों।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ५ अप्रैल, २०१८ ई०)