डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
केन्द्र-शासन की आरक्षण-नीति की स्पष्ट मंशा अब समझ में आने लगी है कि देश को योग्य, कर्मठ तथा प्रतिभाशाली जातियों की आवश्यकता नहीं है। या तो संख्या के आधार पर जातियों को उपेक्षा, तिरस्कार तथा अपमान का जीवन दोयम श्रेणी के नागरिकों की भाँति जीना होगा या फिर इस तथाकथित काग़ज़ी राष्ट्रीय एकता को तोड़कर अमानवीय आरक्षण के विरुद्ध आवाज़ उठानी होगी। आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में पहल करनेवाले संयोगवश ‘सवर्ण’ ही हैं ; अर्थात आरक्षित जातियाँ सवर्णों के राजनीतिक हथियार से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। अभी तक यही दृश्य सभी के सामने है; किन्तु ‘मत’ पाने के स्वार्थ के लिए इस ‘आत्मघाती’ हथियार का आख़िर कब तक इस्तेमाल किया जाता रहेगा?
अस्ल में, आरक्षण देकर शुरू में ही शासन ने ग़लती की थी और वही ग़लती लगातार होती आ रही है | आरम्भ में, १० वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया था; लेकिन इसे १० वर्षों के लिए और बढ़ा दिया गया था और उसके बाद से लगातार ग़लती की जा रही है। इस समय इसका कोई भी राजनीतिक दल विरोध नहीं करना चाहता; क्योंकि राजनेताओं को इन सब जातियों से ‘मत’ प्राप्त करना है।
वर्तमान सरकार इतनी मनबढ़ हो चुकी है कि देश की बहुसंख्यक जातियों की उपेक्षा कर प्रोन्नति के लिए कतिपय जातियों को आरक्षण देकर अपने उद्धत और निरंकुश चरित्र का परिचय दे चुकी है, जिसके कारण हमारे देश की वास्तविक प्रतिभाओं के साथ खुले रूप में अन्याय किया गया है; अत: मात्र एक विकल्प रह गया है, और वह यह कि आगामी चुनावों इस अहंकारी सरकार की सत्ता को हम उखाड़ फेंके।
आइए! संकल्प करें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २४ जून, २०१४ ईसवी)