आइए! आरक्षण और प्रति-आरक्षण का मुखर ‘विरोध’ करें

राजनीति और प्रशासनिक विभाग 'अपराध' के पर्याय के रूप में बहु-विध रेखांकित होते रहेंगे तथा लोकतन्त्र मात्र अभिशप्त बनकर रह जायेगा।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

‘आरक्षण’ का परिणाम और प्रभाव देश को अयोग्य और असमर्थ की पंक्ति में ला खड़ा करेगा और एक दिन ऐसा भी आयेगा, जब देश पर ‘नितान्त’ अक्षम, मूल्य और संस्कारविहीन लोग शासन-प्रशासन करने लगेंगे; राजनीति और प्रशासनिक विभाग ‘अपराध’ के पर्याय के रूप में बहु-विध रेखांकित होते रहेंगे तथा लोकतन्त्र मात्र अभिशप्त बनकर रह जायेगा।

इस विषय पर सामाजिक, बौद्धिक, राजनीतिक तथा संवैधानिक संस्थाएँ मुखर नहीं हो पा रही हैं। सर्वाधिक निन्दनीय और गर्हित भूमिका उस बुद्धिजीवी-वर्ग की है, जो कहीं-न-कहीं नियोजित है (बेरोज़गारी से मुक्त) और स्वयंं तक सीमित रहकर, इस विषय पर संवाद करने और सक्रिय रहने से कतराता आ रहा है। ऐसी क्लीव मनोवृत्ति समाज के लिए नितान्त घातक है। जो सामाजिक विकृतियों के विरुद्ध मनसा-वाचा-कर्मणा में से किसी भी स्तर पर अपना योगदान न करे, उसे समाज में रहने का कहीं-कोई अधिकार नहीं। ऐसे लोग समाज के मूलाधार को शिथिल करने तथा उसकी समरसता को शुष्क और विषाक्त बनाने में अपनी कुत्सित भूमिका का निर्वहन करते आ रहे हैं। यही कारण है कि देश का प्रत्येक राजनीतिक दल समाज को धर्म, जाति, वर्गादिक में विभाजित कर, अपना उल्लू सीधा करता आ रहा है और ‘देश’ का ‘काग़ज़ी’ लोकतन्त्र किंकर्त्तव्यविमूढ़ बना हुआ है। ऐसा इसलिए भी कि देश में संसद् की शोभा बढ़ानेवाले अब बिकाऊ हो गये हैं; दूसरे दलों-द्वारा टुकड़े फेंक दिये जाते हैं और कुत्ते की तरह से लपककर दूसरे दलों की चाकरी करने में जुट जाते हैं; जबकि कुत्ता ‘स्वामीभक्त’ होता है। ऐसे ही बिकाऊ नेता देश के लोकतन्त्र को नीलाम करने से चूकते नहीं। आज देश के सभी दलों के नेताओं का स्वर आरक्षण के विरोध में मौन बनकर रह गया है। यही कारण है कि भारतीय संसद् अपनी उदात्त लोकतन्त्रीय परम्परा की मूल धुरी से हट चुकी है। संसद् अपनी प्रासंगिकता खोती जा रही है। शिक्षा-दीक्षाविहीन अपराधियों, कुसंस्कारियों से देश की संसद् और राज्य के विधानसभा, विधानमण्डल का ‘महिमा-मण्डन’ हो रहा है। जिन धूर्त्त-मक्कार राजनेताओं को अम्बेडकर के विषय में उसके ‘क, ख, ग’ तक की समझ नहीं है, वे भी अम्बेडकर के नाम पर ‘सरकारी’ दलितों की राजनीति करते हुए, ‘आरक्षण’ का समर्थन करते आ रहे हैं।

‘राजनीति में आपराधिक गतिविधियों’ से सम्बन्धित गठित ‘बोहरा आयोग’ के प्रतिवेदन और संस्तुतियों से सुस्पष्ट हो चुका है कि ‘अपराध में राजनीति’ और ‘राजनीति में अपराध’ एक-दूसरे के पूरक हैं। ऐसे में, सहज ही कल्पना की जा सकती है कि देश अपकर्ष और नैतिकता-राहित्य पथ की ओर, दूरगामी परिणामों-प्रभावों की चिन्ता किये बिना अति तीव्रगामी होने के लिए व्याकुल है।

भारतीय समाज कैसे विश्रृंखलित हो; जाति-धर्म, पन्थ, वर्गादिक में कैसे पार्थक्य स्थापित हो; सामाजिक मनभेद का कैसे चरम उत्कर्ष हो आदिक अब राजनेताओं के मूल विचार और आचरण-बिन्दु बनकर रह गये हैं तब ऐसे में स्वस्थ राजनीतिक वातावरण बनने-बनाने का विषय हास्यास्पद प्रतीत होता है। ऐसी समाज और राष्ट्रघाती परिस्थितियों से जनसामान्य आक्रान्त है और सत्तालोलुप स्वकेन्द्रित तत्त्व जघन्य स्वार्थ-सिद्धि की दिशा में प्रयत्नशील हैं। दूसरे शब्दों में, “फूट डालो और शासन करो” को चरितार्थ करते हुए, किंकर्त्तव्यविमूढ़ की मन: दशा में लोक, ‘तन्त्र’ के अधीन बनकर मूकदर्शक की भूमिका में दृष्टिगोचर होते रहेंगे।

आरक्षण का विरोध करना अब अपरिहार्य हो गया है; क्योंकि वर्तमान केन्द्रीय शासन ने ‘सत्ता की गर्हित’ राजनीति करते हुए, ‘आरक्षण-पर-आरक्षण’ यानी कुछ जातियों के लिए पदोन्नत में भी आरक्षण को लागू कराने का आदेश करा दिया है। ऐसा इसलिए भी कि विकास और हिन्दुत्व की राजनीति कर, अपना प्रभाव-प्रसार करनेवाले सत्ताधारी राजनेता जब अपनी नीयत और नीति में धोखेबाज़ी का तत्त्व मिलाने में पूर्णत: विफल हो गये तब ‘दलित चाल’ चलकर देश की मुख्य धारा को अपने पक्ष में मोड़ने की दिशा में लग गये हैं, जिसे देश का जागरूक मतदाता जानने और समझने लगा है।

‘आरक्षण’ और ‘प्रति-आरक्षण’ समाप्त करने के विषय में गम्भीरतापूर्वक चिन्तन करने और समाधान-निराकरण करने-हेतु प्रयास करने के लिए किसी भी राजनेता के पास अवकाश तक नहीं है; देश की अधिकतर जनता इस विषय पर बँटी हुई है; क्योंकि जनता उदरपूर्ति करने में येन-केन-प्रकारेण जुटी हुई है। इसके साथ ही वह नख-शिख आपराधिक गतिविधियों का विविध भूमिकाओं में संचालन करने में निष्णात भी हो चुकी है। देश की समस्त जातियों-वर्गों, धर्मों आदिक के प्रतिनिधि-वर्गों को इस दिशा में समग्रत: गम्भीरतापूर्वक ‘राजनीति-निरपेक्ष’ संवाद करना होगा। आरक्षण असाध्य नहीं है; परन्तु इसके लिए ‘स्वार्थपरता’ के सघन अरण्य से निकलना होगा।
निस्सन्देह, समाज के निर्बल जाति, धर्म, वर्गादिक को प्रत्येक स्तर पर ‘मानवीय’ आधार पर सहयोग-सहायता प्राप्त होनी चाहिए; किन्तु ‘जाति, धर्म, वर्गादिक-विशेष’ के आधार पर कदापि नहीं। इससे जातीय, धर्मीय, वर्गीय आदिक वैमनस्य और द्वेष की ‘चिनगारी’ फूटने लगेगी, जो ‘महाज्वाल’ का रूप लेकर भारतीय समाज की शेष अखण्डता को भस्मीभूत कर देगी; अत: समाज की समरसता में हलाहल मिश्रित करनेवाले समाजद्रोही वर्ग का पूर्णत: बहिष्कार करने की अब आवश्यकता है; क्योंकि ऐसे राष्ट्रघाती तत्त्व जब अलग-थलग पड़ जायेंगे तब उनकी सारी शक्ति क्षीण होती जायेगी; परिणामत:-प्रभावत: उनकी सक्रियता भी शिथिल दिखने लगेगी।
अस्तु, समाज के समस्त जातियों, वर्गों आदिक को आरक्षण और प्रति-आरक्षण के विरोध में मुखर होकर आना होगा, अन्यथा देश के मनबढ़ ग़द्दार नेता अपनी सत्ता को बचाने और बनाने के लिए किसी भी सीमा का उल्लंघन कर सकते हैं ।

आइए! हम सब राष्ट्र के उत्थान में अपना योगदान करने में समर्थ युवा-वर्ग के पक्ष में सामान्य आरक्षण और पदोन्नत के लिए दिये जानेवाले आरक्षण का मुक्त भाव-विचार के साथ समवेत स्वर में विरोध प्रकट करने के लिए शपथ लें और संकल्प करें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २१ जून, २०१८ ई०)