
सुधीर अवस्थी ‘परदेसी’ बघौली-
नवरात्र शुरू हो चुके मातु , आकर के दर्शन दे जाना।
उपवास किया मां तेरे लिए, एक दिन मेरे भी घर आना।।
पता मातु मुझे भली भांति, तुम हमको छोड़ न जाती हो।
देख न पाता हर पल मैया, ऐसा कुछ कर जाती हो।।
कहीं छुपो ना मेरी माते, व्याकुल मन अकुलाय रहा।
आओ दर्शन दे दो अम्बे, भक्त तुम्हारा बुलाय रहा।।
पूजा-पाठ और वेद मन्त्र, अर्चन-वन्दन का ज्ञान नहीं ।
दया की सागर मेरी मैया, कर पाऊँ उसका बखान नहीं।।
जैसा भी हूं तेरा हूं मां, मुझको तुझ पर नाज है।
भीड़ पड़ी जब भी ‘परदेशी‘ , रखी तूने लाज है।।
रचयिता- सुधीर अवस्थी ‘परदेशी‘ , रचना समय- 11ः31 प्रातः, दिन- बुधवार स्थान- हमारा पम्प बघौली-अमित