● आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की आज (१९ मई) मृत्युतिथि है।
एक रोचक संस्मरण
★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भाषाविद्-समीक्षक-)
अध्यापक, आलोचक, सम्पादक तथा साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने यद्यपि ‘दुबे छपरा’, बलिया में जन्म लिया था और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (वाराणसी), शान्ति निकेतन (कलकत्ता) तथा पंजाब विश्वविद्यालय को अपने कर्मस्थल बनाये थे तथापि इलाहाबाद के साथ उनका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध था। इसके तीन कारण थे :– पहला, हिन्दी साहित्य सम्मेलन; दूसरा, प्रकाशन-प्रतिष्ठान तथा तीसरा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय । साठ के दशक में आचार्य द्विवेदी का हिन्दी साहित्य सम्मेलन में महनीय सारस्वत स्थान था।१९६५ ई० में उन्हें ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ प्रयाग की ओर से ‘साहित्यवाचस्पति’ उपाधि से विभूषित किया गया था। सम्मेलन के बौद्धिक आयोजनों में उनकी विशिष्ट भागीदारी होती थी। प्रकाशन-प्रतिष्ठान की दृष्टि से उन दिनों इलाहाबाद के ‘लोकभारती’ और ‘साहित्यभवन’ की उन्नत स्थिति थी। आचार्य जी की निबन्धात्मक कृतियाँ ‘अशोक के फूल’ और ‘विचार और वितर्क’ क्रमश: यहीं से प्रकाशित की गयी थीं। आगे चलकर, उन पर अनेक सम्पादित कृतियाँ सार्वजनिक हुई थीं, जिनमें से डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी और चौथीराम यादव-द्वारा क्रमश: सम्पादित पुस्तकें– ‘साहित्यकार और चिन्तक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी : समग्र पुनरावलोकन’ हिन्दुस्तानी एकेडेमी और लोकभारती से प्रकाशित किये गये थे।
उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय का हिन्दी-विभाग सारस्वत सम्पदा से परिपूर्ण था, तब अधिकतर अध्यापक अपने मूल कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान और योग्य होते थे। प्राय: हिन्दी-विभाग की ओर से आयोजित मौखिक परीक्षाओं में परीक्षक के रूप में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को निमन्त्रित किया जाता था। उसी अवधि में एक रोचक; किन्तु विचारणीय घटना घट गयी थी। हुआ यों कि आचार्य द्विवेदी जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग में एम०ए० की मौखिक परीक्षा ले रहे थे। उन दिनों एकांकी-सम्राट कहलानेवाले डॉ० रामकुमार वर्मा विभागाध्यक्ष थे। एक छात्रा का नाम पुकारा गया था। वह रूपवती छात्रा परीक्षाकक्ष में पहुँची। पण्डित द्विवेदी जी ने डॉ० वर्मा की ओर देखते हुए, उस छात्रा से प्रथम प्रश्न किया था,”एकांकी किसे कहते हैं?” उस छात्रा ने बेहिचक उत्तर दिया था,”सर जी! एकांकी-काल सुन्दरी के सुन्दर कपोलों पर एक मधुर चुम्बन है।” उसका उत्तर सुनकर आचार्य जी का मस्तक झुक गया। उन्होंने उसी समय उस छात्रा से कहा, “अब तुम जाओ।” उस छात्रा के जाने के बाद पं० द्विवेदी जी ने दु:खी मन से डॉ० रामकुमार वर्मा कहा,”ये क्या तमाशा है? इससे एकांकी का क्या पता चलता है?” इस पर डॉ० वर्मा ने संकोच और गर्व मिश्रित शैली में उत्तर दिया था, “पण्डित जी! यह मेरी ही परिभाषा है। जो मैंने लिखवाया है, वही बच्ची ने बताया है।” इस पर पण्डित जी ने अप्रसन्न होते हुए कहा, “मेरी चिन्ता का विषय यह नहीं है कि किसकी परिभाषा है। मेरी चिन्ता का विषय है कि एक अंक का छोटा एकांकी काल-सुन्दरी के सुन्दर कपोलों पर अगर एक चुम्बन है तो सात अंकों का नाटक उस काल-सुन्दरी के साथ क्या होगा?” इस पर डॉ० वर्मा ने ग्लानि का अनुभव किया था।
इससे शिक्षा प्राप्त होती है कि आलोचना की भाषा को काव्य की भाषा-शैली में लिखने से आलोचना का ‘अनर्थ’ होता है।