देश की अर्थ-व्यवस्था के राजनीतीकरण का परिणाम भुगतना होगा

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज भारत की अर्थ-व्यवस्था उन बन्दरों के हाथों में है, जो उस्तरा लेकर देश की सामान्य जनता की कटौती में सेंध लगाकर ‘कतर-ब्योंत’ करने में लगे हैं। वर्तमान सरकार चलानेवाले बेहद शातिर हैं। पेट्रोल-डीज़ल में निर्ममतापूर्वक लगातार बढ़ोतरी जारी है, जिसके कारण जनसामान्य महँगाई से त्रस्त हो चुका है।

वर्तमान में देश की विकृति अर्थव्यवस्था चार प्रकार की चुनौतियों से जूझ रही है :—

पहली– सम्प्रति, देश का परिव्यय (बजट)-घाटा ‘सकल घरेलू आय’ के प्रतिशत के रूप में अत्यधिक वृद्धि को प्राप्त कर गया है, जिसका परिणाम और प्रभाव अघोषित; किन्तु व्यावहारिक ‘मुद्रा-स्फीति’ के रूप में हमारे सामने है; साथ ही जनहित-योजनाएँ अधर में लटकी पड़ी हैं।

दूसरी— केन्द्र-राज्यों की सरकारें लगातार अत्यधिक मात्रा में बाज़ार से ऋण लेती आ रही हैं, जिसके कारण दोनों सरकारों के परिव्यय का एक बड़ा भाग ब्याज-भुगतान करने में ही व्यय होता जा रहा है।

तीसरी— भारतीय उद्योगों की उत्पादन-क्षमता में बहुत ही अधिक गिरावट आ चुकी है। यही कारण है कि वर्तमान में केन्द्र और राज्य की सरकारें विदेशी उद्योगपतियों के सम्मुख स्वयं को ‘शरणागत’ के रूप में प्रस्तुत करती आ रही हैं और अपने देश के उद्योगों को रुग्ण बनाने में कहीं-कोई विकल्प नहीं छोड़ रही हैं। भारत की आयात-निर्यात-नीति भी लोकविरोधी दिख रही हैं। इसके कारण देश में रोज़गार की सम्भावनाएँ घटती नज़र आ रही हैं। इतना ही नहीं, देश के प्रमुख शासकीय प्रतिष्ठान ‘निजी हाथों’ में सौंप दिये गये हैं और सौंपे जा रहे हैं।

चौथी चुनौती— देश का कृषि-उत्पादन घटता जा रहा है। घोर आश्चर्य का विषय है कि पिछले छ: वर्षों में कृषि-क्षेत्र में दो-तीन प्रतिशत की भी वृद्धि नहीं हो पा रही है। इसके परिणामस्वरूप देश में आये-दिन किसान उग्र प्रदर्शन और आत्महत्या करता आ रहा है। कृषि-उत्पादन में वृद्धि के लिए जितना निवेश किया जाता है, उसके अनुसार किसान को उस निवेश का पूर्ण लाभ अर्जित नहीं होता।

आज आवश्यकता इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की है कि बाज़ार और सरकार के सम्बन्ध तथा उनकी परिवर्त्तनशीलता पर भी मन्थन किया जाये। ‘वस्तु एवं सेवाकर’ (जी०एस०टी०) में सरकार ने अपने राजस्व की वृद्धि करने और देश की जनता को लूटने के लिए जिस प्रकार से बहुस्तरीय उपाय किये हैं और ‘एक राष्ट्र और एक कर’ बताकर जनसामान्य की आँखों में वर्तमान केन्द्र-सरकार ने जिस तरह से धूल झोंकी है, उसका दुष्परिणाम प्रत्यक्ष हो चुका है।

वर्तमान वित्त और वाणिज्यमन्त्री की अनुभवहीनता, अपरिपक्व दृष्टिबोध, अस्पष्ट वित्तीय कार्य-योजनाओं तथा केन्द्र-सरकार की लोकविरोधी आर्थिक नीतियों के कारण आज देश जिस आर्थिक दुरवस्था से होकर गुज़र रहा है, वह भारतीय अर्थशास्त्रियों के लिए नितान्त शोचनीय है। इसके बाद भी सरकार हाथ-पर-हाथ धरे बैठे प्रतीत हो रही है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० जुलाई, २०२० ईसवी)