‘मुक्त मीडिया’ का आज का सम्पादकीय
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
देश के स्नातक-उपाधि-प्राप्त समस्त अनियोजित (बेरोज़गार) युवाओं के लिए सरकार प्रति युवा १० हज़ार रुपये प्रतिमाह ‘मानधन’ देने की व्यवस्था करे, अन्यथा युवावर्ग दिग्भ्रमित हो जायेगा और नकारात्मक पथिक बनकर एक ऐसे आत्महन्ता और दुर्धर्ष रूप को प्राप्त कर जायेगा, जिसे नियन्त्रित कर पाना, “लोहे के चने चबाना” सिद्ध होगा।
पूर्णत: दिशाहीन शिक्षा-परीक्षापद्धति के परिणाम और प्रभाव ने देश की युवाशक्ति की चेतना को सुषुप्त बनाकर रख दिया है। देश का मूलभूत शैक्षिक वातावरण विषाक्त कर दिया गया है। शिक्षा-संस्कृति को विकृत करने की केन्द्र-राज्य-शासन की प्रत्यक्ष-परोक्ष अकर्मण्यता परिलक्षित हो रही है। शिक्षामन्दिर में गर्हित राजनीति की मूर्तियाँ स्थापित कर, सारस्वत सात्त्विकता का स्खलन किया जा चुका है।
आज पठन-पाठन, अध्ययन-अध्यापन, अनुशीलन-परिशीलन, चिन्तन-अनुचिन्तन, सन्धान-अनुसन्धान तथा ग्रहणशीलता पक्षाघात-रोग से ग्रस्त हो गयी हैं। एक सामान्य अध्यापक से लेकर कुलपति तक के पास अवकाश नहीं है कि वे विद्यार्थी के लिए भविष्यघातक बनायी गयी शिक्षापद्धति को ‘शिक्षा के मूल उद्देश्य’ के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करें और समुचित परिष्कार की व्यावहारिक सम्भावनाओं के साथ स्वयं को सम्बद्ध करें।
अब भी समय है, राजनीति के वितण्डावाद से शैक्षणिक परिसर को सुदूर करें और ‘कलह’ की आराधना के स्थान पर ‘समन्वय’ और ‘सामंजस्य’ की स्थापना करने की दिशा की ओर अग्रसर हों।
वाह! चुनाव आसन्न रहता है तब सत्ता के छिछोरे चेहरे शतरंज बिछाकर अपने-अपने मुहरों को सटीक जगह रखने की तैयारी करते हैं। व्यक्ति, समाज, राज्य तथा देश उनकी बाज़ीगरी से संकट और संत्रास की स्थिति में दिखने लगती है।
आज पक्ष-विपक्ष के सभी महारथी शालीन और सहिष्णु रहे देश को एक ऐसा ‘कुरुक्षेत्र’ बना चुके हैं, जहाँ दोनों ओर से दुर्योधन और दुश्शासन गन्दे नाले में बजबजाते कीड़े की तरह से दिखनेवाली अपनी-अपनी सेना का संचालन करते आ रहे हैं।
सत्तापक्ष कितना बीभत्स, बेहया तथा बेशर्म है, जिसे जिन-जिन आधारों पर अप्रत्याशित बहुमत के साथ लोकतन्त्र का प्रहरी बनाया गया था, उन सभी आधारों पर आज कुत्ते मूत्रदान कर रहे हैं। कहाँ है, विकास का पहिया? कहाँ है, गरजनेवाला बादल? कहाँ है, दाँत पीस-पीसकर तत्कालीन सरकारों की कमियाँ गिनाकर भरी सभा में वाहवाही लूटनेवाला शेर की खाल में दिखनेवाला भेड़िया?
समाज में धर्म, वर्ग तथा जातिवादिता का ज़ह्र छिड़ककर ‘अय्यार’ की भूमिका में दिखनेवाले कदाचारी, कामी, कुत्सित, कुकर्मी, क्रूर-कुटिल कहाँ हैं? ऐसे घातक और राष्ट्रद्रोही हमारे देश ‘भारत’ की ‘जड़’ खोदकर, हमारी सदाशयपूर्ण विश्वविजयिनी संस्कृति “सर्वधर्म समभाव” को बर्बरतापूर्वक निकालने के बाद, उसके स्थान पर ‘सर्वधर्म दुर्भाव’ की ‘कुसंस्कृति’ का रोपण कर चुके हैं, जो आनेवाले कल में ‘भस्मासुर’ का चरित्र ग्रहण कर लेगा, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
देश में लोकतन्त्र का सजग प्रहरी कहलानेवाला विपक्षवर्ग को “एकोहम् द्वितीयोनास्ति” की आराधना करनेवालों ने उखाड़ फेंका है, जिसके लिए स्वयं विपक्षवर्ग ही उत्तरदायी है। विपक्षी दलों के पारस्परिक द्वेष-ईर्ष्या, वैमनस्य-जन्य फूट का ही परिणाम है कि आज देश में सत्तापक्ष स्वेच्छाचारिता-निरंकुशता का परिचय देते हुए लोकमानस की आकांक्षाओं और स्वप्नों का अपहरण करता आ रहा है। इसके लिए देश की जनता को विविध कुत्सित विषयों के प्रलोभन में फँसाकर, उसकी आस्था का दोहन कर उसे इतना शिथिल कर दिया गया है कि वह चाहकर भी विरोध और विद्रोह का स्वर बलन्द नहीं कर पा रहा है। देश का बुद्धिजीवी-वर्ग भी कई ख़ानों में बँट चुका है। उसकी सम्मिलित शक्ति और आवाज़ क्रीतदासत्व की ओर धकेली जा चुकी है। ऐसे में, वह वर्ग ठीक उसी भूमिका में है, जिस भूमिका में, द्रौपदी-चीरहरण के समय पहली ओर, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, नीतिज्ञ विदुर, कृपाचार्य, कर्ण इत्यादिक तो दूसरी ओर, अर्जुन, भीम, सत्यवादी-धर्माचार्य युधिष्ठिर इत्यादिक महारथी होते थे।
प्रतीक्षा है, एक और महाभारत की; तलाश है, एक और कृष्ण की।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ नवम्बर, २०२० ईसवी।)