योगेश समदर्शी (कवि/प्रकाशक)-
मैं जिसे लिख ही न पाया, पीर मुझको खा रही है
और खामोशी मेरी इक आग बनती जा रही है।
१.
मुझमे कोई हँस रहा है, हाथ में विषधर लपेटे
और मैं स्तब्ध हूँ बस भाव अंतस में समेटे
ये रुदन की सी ध्वनि बस कंठ से ही आ रही है
और खामोशी मेरी इक आग बनती जा रही है।
२.
खौफ कितना है भयावह, बेबसी के रूप कितने
दंड देने को स्वयं में ही खड़े हैं भूप कितने
रूह अंतस में रुदन आलाप ले कर गा रही है
और खामोशी मेरी इक आग बनती जा रही है।
3.
कंठ में अटके हुए हैं आज भी संवाद कुछ तो
देखना मुझमे मिलेंगे आपको अपवाद कुछ तो
आग पीड़ा की कहीं से तो हवा सी पा रही है
और खामोशी मेरी इक आग बनती जा रही है।
४.
रोकता हूँ मैं स्वयं को सच कहीं निकले न मुँह से
शब्द की जब थी जरूरत तब वही निकले न मुँह से
और देखो इस जहां को बस ये चुप्पी भा रही है
और खामोशी मेरी इक आग बनती जा रही है।