बिखरते और सिमटते परिवार

परिवार के भीतर पति पत्नी और बच्चे शामिल होते हैं। ये आज का एकल परिवार है। जब हम रामायण महाभारत के युग की बात करते हैं तो दादा दादी ताऊ ताई चाचा चाची सहित परिवार हुआ करता था। जिसे संयुक्त परिवार कहा जाता था। ये संयुक्त परिवार बड़ा परिवार होता था।जिसमें सभी भाई उनकी पत्नियां दादा दादी माता पिता साथ रहते थे। घर का मुखिया परिवार का सबसे वरिष्ठ सदस्य हुआ करता था। उसकी सभी बात मानते मुखिया की आज्ञा का पालन जरूरी था। भगवान राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन कर महलों को त्यागा और चौदह साल का वनवास भोगा। संयुक्त परिवार में सब परिवार के सदस्य साथ साथ रहते साथ खेलते साथ भोजन करते साथ पर्व त्योहार मनाते थे। एक दूसरे के सुख दुख में साथ देते एक दूसरे की आर्थिक सहायता करते थे। परिवार में संगठन होने से ताकत थी। खेती बाड़ी का काम आसानी से हो जाता था। छोटे छोटे परिवार के आयोजनों में कोई समस्या नहीं आती थी। महाभारत काल मे कितने बड़े परिवार थे। कौरव के सौ भाइयों के बड़े परिवार में मामा शकुनि भी साथ रहता था।

आज परिवार बिखरता जा रहा है। सब अलग अलग होने लगे। आज एकल परिवार बन रहे हैं। पति पत्नी व बच्चे जिसमें रहते हैं। वे बच्चे दादा दादी का अर्थ नहीं जानते। केवल पिता माता के अलावा कोई रिश्ता नहीं पहचानते। पहले छोटे बच्चों को दादा दादी पास में रखते उनकी देखभाल करते उन्हें आशीर्वाद देते। दादा दादी कहानियां सुनाते। अब बच्चे ये सब कैसे सुनें। उन्हें दादा दादी का लाड़ दुलार अब नहीं मिलता। जिनसे बच्चों को संस्कार मिलते चरित्र निर्माण होता था। वे महापुरुषों की कहानियां अब उन्हें कौन सुनाता है। पापा मम्मी तो ऑफिस चले जाते और छोटे बच्चे नौकरानी के भरोसे रहते हैं। भला नोकरानी आपके बच्चों को क्या शिक्षा देगी।बिखरते परिवार में बच्चों का प्यार भी सिमट गया है। लाड़ दुलार वात्सल्य प्रेम ये शब्द अब परिवार में कौन दें। इनकी अनुभूति अब कैसे हो।
बढ़ती इच्छाएं महत्वाकांक्षाओ के कारण परिवार टूटे हैं। धन के पीछे अंधी दौड़ में लगा आज का मनुष्य खून के रिश्तों को भी भूलने लगा है। दुनिया के सारे भोग विलासिता के साधन जुटाने में मनुष्य लग रहा है। रिश्तों में अपनत्व नहीं रहा लोग सुख में तो साथ हो जाएंगे मगर दुख में मुँह फेर लेते हैं। वास्तविकता यही है। आपके पर्स में रुपये हैं तभी तक आपके पास सभी रिश्ते हैं पर्स खाली होते ही मित्र सगे सम्वन्धी साथ छोड़ देते हैं। ऐसे मतलबी लोग अब समाज मे रहते हैं।

रामायण काल से देखें तो परिवार को बिखरने का कार्य केकयी मंथरा ने किया राम लक्ष्मण सीता वन चले गए। भरत कुटिया बनाकर राज्य से बाहर चले गए। सारा परिवार ही तो बिखर गया। दशरथ जी पुत्र वियोग में स्वर्ग सिधार गयर महाभारत को पढ़ें तो पता चलेगा मामा शकुनि ने षड्यंत्र रचकर भाइयों भाइयों में बैर कर डाला। बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। इस महा संग्राम में सारा परिवार बिखर गया। परिवार एक पाठशाला है जहां संस्कारों का बीजारोपण होता है।

आज देश से बाहर शिक्षा लेने युवा पीढ़ी को हम भेज रहे हैं। भारत मे नहीं पढ़ाते अमेरिका जॉर्जिया चीन हमारे बच्चे लड़कियां डॉक्टर की ट्रेनिंग कर रहे। वहाँ नॉकरी कर रहे। तो उनमें विदेशी संस्कार आएंगे ही। परिवार भी बिखरेगा। प्यार तो उन्हें मां बाप का कैसे मिलेगा। आज हम विज्ञान के कारण खूब प्रगति कर रहे ये अच्छी बात है लेकिन हम हम मानवीय जीवन मूल्य त्याग समर्पण प्रेम भाईचारा करुणा दयाभाव सहयोग सहानुभूति जैसे अच्छे गुण भूल गए जो एक मनुष्य के लिए अति आवश्यक है।

पहले अपना गांव छोड़ने की कल्पना करना भी पाप माना जाता था। अपने पुरखों की जमीन पुष्तैनी मकान से बाहर कहीं नहीं जाते थे। उनकी विरासत को सम्भालते थे। लेकिन आज नगर महानगर में परिवार गांव छोड़कर जा रहे हैं। गांव खाली होते जा रहे। शहरो में रहने लगे हैं। अब कोई मेहनत करना नहीं चाहता। विज्ञान के कारण भोग विलासिता के साधनों का भोग करने में लग गया। अब मेहनत से जी चुराने लगे। सर्व परिवार बिखर गए। प्यार सिमट गया।

डॉ. राजेश कुमार शर्मा ‘पुरोहित’
कवि/साहित्यकार, भवानीमंडी, जिला झालावाड़
राजस्थान