★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कितना प्यारा लगता झरना,
पर्वत से जब झरता झरना!
कलकल-छलछल गीत सुनाकर,
सबका मन है हरता झरना।
उठता-गिरता, गिरता-उठता,
कष्ट है कितना सहता झरना!
आज गिरा है कल तो उठेगा,
ठोकर खाकर बढ़ता झरना।
कष्टों से है क्या घबराना ,
सबको सीख सिखाता झरना।
राह कठिन है दूर है मंज़िल,
बढ़ना हमें सिखाता झरना।
कायर क्या बाज़ी जीतेंगे,
मस्ती में इठलाता झरना।

(‘गाओ-गुनगुनाओ’ से साभार उद्धृत)
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० जुलाई, २०२१ ईसवी।)