इच्छाशक्ति सुदृढ़ हो तो मनुष्य प्रभंजन (प्रचण्ड वायु) की गति को भी विपरीत दिशा की ओर मोड़ने में समर्थ हो जाता है। पौरुष का अधिकारी वही होता है, जो अपने कथन और कर्म के धरातल पर एकान्वित (एकरूप) रहते हुए, संकल्पबद्धता के साथ समस्त अवरोध, व्यवधान (विघ्न) तथा व्यतिक्रम (पाप) को पराभूत (परास्त) करता लक्षित होता है।
(‘अवरोधों’, ‘व्यवधानों’ तथा ‘व्यतिक्रमों’ के प्रयोग अशुद्ध हैं।)
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ अगस्त, २०२१ ईसवी।)