★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कुछ दिनों से एक ऐसे ऐतिहासिक नगर में हूँ, जहाँ ‘महब्बत का विश्वप्रसिद्ध अनुपम प्रतीक’ देखते ही बनता है। यह नगर मेरे लिए इसलिए भी अनन्य है कि देश की तीन प्रमुख प्रतियोगितात्मक पत्रिकाओं :– क्रमश: ‘प्रतियोगिता विकास’, ‘प्रतियोगिता दर्पण’ तथा ‘साहित्य भवन प्रतियोगिता-पत्रिका’ के सम्पादक, कार्यकारी सम्पादक तथा प्रधान सम्पादक का पदभार-वहन करते हुए, प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं की तैयारी में लगे विद्यार्थियों का सम्यक् रूपेण मार्गदर्शन करता रहा। लेखन-स्तर पर देश के कई चेहरों को पहचान दिलाते हुए, उनका रचनात्मक विकास भी किया। उपर्युक्त पत्रिकाओं में पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ दायित्व-निर्वहण करते हुए, सम्बन्धों के नाना आयाम प्रगाढ़ होते रहे और धुन्ध में समाते भी रहे।
यहाँ की अनेक सड़कें और गलियाँ मुझे देखते ही बोलने लगती हैं और मेरे मौन को चीरते हुए, पार्श्व में ही खड़ी प्रतीत होती हैं। बज़ार, ढाबे, होटल, रेलस्टेशन, बसस्टेशन आज भी गुलज़ार हैं; बल्कि पहले से अधिक पसीना पोंछते अपने ‘धूमधाम’ को रेखांकित करने का प्रयत्न भी कर रहे हैं।
कहाँ वर्ष १९९३ से वर्ष २००२ का वो अपेक्षाकृत अधिक संकुचित वातावरण और कहाँ वर्ष २००३ से वर्ष २०२१ का विस्तृत फैलाव। जानी-पहचानी सड़कों और गलियों को निहारता हूँ तो लगता है, मानो दशकों-पूर्व कुछ खोया हुआ पाने के लिए दबी-दबी आकांक्षा के साथ मोहावरण उतार फेंकते हुए, अनासक्ति के द्वार पर आ पहुँचा हूँ।
राजामण्डी के समीप मुख्य मार्ग पर स्थित ‘वृन्दावन होटल’, जहाँ कई माह तक रहकर प्रतियोगितात्मक सामग्री का लेखन-सम्पादन करता रहा, आँखों से ओझल नहीं हो पा रहा है। यह नगर मेरे जीवन का एक ऐसा सारस्वत पड़ाव था, जहाँ छ: स्थानों पर मेरे आवास रहे :– वृन्दावन होटल, दिल्ली गेट, प्रोफ़ेसर कॉलोनी, विश्वविद्यालय के समीप की बस्ती, न्यू राजामण्डी कॉलोनी के दो घर।
इस समय जहाँ पर मुझे ठहराया गया है, वह दिल्ली गेट के समीप स्थित ‘पुष्पांजलि हॉस्पिटल’ के ठीक सामने का ‘एमिनेण्ट होटल’ है। होटल का २०४ संख्यावाला कक्ष प्रथम तल पर स्थित है ।
क्षुद्र स्वार्थ और अपेक्षाओं से मेरी सदैव दूरी रही है, इसलिए किसी को ग्रन्थिरहित सम्बन्धडोर से आबद्ध नहीं कर पाया; कोई दु:ख भी नहीं रहा है; क्योंकि एकाकी राह का पथिक रहकर यात्रा करने का वास्तविक आनन्द कुछ और ही होता है।
सुखद विषय यह है कि पूर्व-घोषित मेरी सामान्य हिन्दी की पुस्तक ‘समग्र सामान्य हिन्दी’ का प्रकाशन भी इसी ऐतिहासिक नगरी से किया जा रहा है। आत्मविश्वास से भरपूर ‘युक्ति पब्लिकेशन’ के स्वामी प्रियवर मयंक अग्रवाल जी प्रकाशन के इस दायित्व का बहुविध निर्वहण कर रहे हैं। उन्हीं के निमन्त्रण पर यहाँ आकर खट्टी-मीठी स्मृतियों को बनते-बिगड़ते साक्षी दे रहा हूँ। इस पुस्तक की विषय-सामग्री की सम्पन्नता और प्रस्तुति पर दृष्टिपात करते ही मन निर्द्वन्द्व भाव से बोल पड़ता है, ”तुझ-सा कोई नहीं।”
आज देश में जितनी भी सामान्य हिन्दी की पुस्तकें हैं, उन सभी में ‘समग्र सामान्य हिन्दी’ का स्थान सर्वोपरि स्थान रहेगा, कोई संशय नहीं। अक्तूबर-माह में सार्वजनिक की जानेवाली ‘समग्र सामान्य हिन्दी’ मेरे लाखों विद्यार्थियों का सारस्वत पथ प्रशस्त करेगी, विश्वास है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २ अक्तूबर, २०२१ ईसवी।)