शब्द, प्रारब्ध और न्याय


शब्द पास मेरे
कोई शोर नहीं
प्रारब्ध मेरा ये
रौशनी दीये की
पहाड़ की चोटी पर
अंधेरा छंट न सका
सच्चाई है ये
दिखाई जरूर दूंगा
प्रारब्ध मेरा ये l
खून के स्याह धब्बे
दिखा न सका
मैं हर किसी का
मेरा कोई न हुआ
जाहिल गँवार मैं
दुनियाँ भर का
वरसाओ नफरतों के
शोले
हैरान नहीं हूँ मैं
छूट चुका मौत का
डर
चुनौती हारा नहीं मैं
चिता एक बुझती
नहीं
दूजी जल जाती है
न्याय बन गई परछाई
आम आदमी की
पहुंच नहीं
शब्द पास मेरे
कोई शोर नही
शायद
प्रारब्ध मेरा ये।

उदयवीर भारद्वाज
मंदिर रोड कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश