देह के उतार-चढ़ाव के प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’-


युगों-युगों से लाज और स्त्री का चोली-दामन सा साथ रहा है, लज्जा तो स्त्री का आभूषण है । भारतीय स्त्री का प्रतिबिम्ब एक स्वर्ण शरीर की मलिका, चंचल, मृगनयनी के समान ज़ेहन में उभर कर आता है, जिसकी आँखों में हया का सागर छिपा हो, जिसके हर भाव में मोहकता हो, मादकता नहीं ! आकर्षण हो, उद्दीपन नहीं ! देह के उतार-चढ़ाव को आप आँचल के तले महसूस कर सकते हैं उसके लिए प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं। अदब का जामा लिये अपने मोहक हाव-भाव और तीखे नयन-नक्श से सौन्दर्यप्रेमी को प्रभावित करने वाली भारतीय नारी सिर से लेकर पैर तक लज्जा से सराबोर रही है।

पर, अब समय ने करवट बदल ली है, ऐसा लगने लगा है कि लज्जा और नारी का, भारतीय संस्कृति से जो अटूट संबंध था, वह टूट कर बिखरता जा रहा है ।