तथाकथित नारी-विमर्श का ‘सच’

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

नारी को जहाँ तक सम्भव है, सब तरह से बाँध कर रखना; पुरुष का एकान्त अनुगत कर देना, यह समाज-व्यवस्था के लिए कार्यकर होने पर भी समाज-जाति की प्रगति के लिए एक अन्तरार्थ है; क्योंकि इसी व्यवस्था के कारण नारी पुरुष की मात्र ध्वनि बन कर रह गयी है। भले ही नारी आकर्षक हो; सुन्दर हो फिर भी जीवन्त नहीं है। जब तक नारी की स्वतन्त्र व्यष्टि-सत्ता जाग्रत नहीं होती तब तक उसकी निजत्व सृष्टि किसी प्रकार भी सम्भव नहीं। समाज की क्रम-गति, नारी-पुरुष के मिलन पर मात्र प्राण नहीं, एक निविड़ बृहत्तर मन के आदान-प्रदान पर निर्भर करती है। नये आदर्शों की उपलब्धि की चेष्टा में इस प्रकार दो अन्तर जब एक लक्ष्य की और चल पड़ते हैं तब उसी से समाज नये जीवन का रसायन पाता है; किन्तु जहाँ इन दोनों दिशाओं से उन्नत स्तर के विनिमय का अवकाश नहीं है, जहाँ प्रथम ओर से, मात्र आदान और द्वितीय ओर से, प्रदान है वहाँ मन्थरता, शिथिलता, गतानुगतिक संस्कार तथा निश्चलता के तत्त्व संलक्षित होते हैं ।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ जून, २०२० ईसवी)