● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
आज (५ मई) प्रात: बाँसडीह, बलिया (उत्तरप्रदेश) मे प्रभंजन (आँधी-तूफ़ान) के साथ वर्षा के आरम्भिक किशोरावस्था का दर्शन-लाभ प्राप्त हुआ है। उसने किशोरवय मे रहते हुए भी ‘तरुणाई’ की ओर तीव्र गति मे बढ़ने का संकेत कर दिया था (यहाँ ‘दे दिया था’ अशुद्ध प्रयोग है।)। आँधी की गति कम होने का नाम नहीं ले रही थी और छत पर लेटा हुआ मन कह रहा था– मुक्त वातावरण मे अति तीव्र गतिमान वायु का आनन्द लेते रहो; चारपायी का त्याग मत करो।
अन्तत:, मन के आदेश को स्वीकार कर, जीभर प्रचण्ड वेगवान् वायु का आनन्द प्राप्त करता रहा। वायु की गति शिथिल पड़ने लगी, फलत: बरखारानी का शनै:-शनै: वर्चस्व स्थापित होने लगा और वह अवसर पाकर, अकस्मात् अति तीव्र वेगशाली वायु पर प्रभावी होने लगी।
इससे पूर्व कि बरखारानी अपने अँगड़ाई लेने के अनन्तर (यहाँ ‘उपरान्त’ का प्रयोग अशुद्ध है।) पूर्णत: जाग्रतावस्था का अनुभव करातीं, मन ने आदेश किया (यहाँ ‘दिया’ अशुद्ध है।)– चारपायी त्यागकर स्वयं की सुरक्षा करो।
चैतन्य मन का आदेश शिरोधार्य कर, सक्रिय हो चुका था।
जलावगाहन (जलस्नान) कर देह-मालिन्य से आंशिक मुक्ति और मन-परितृप्ति (संतुष्टि) प्राप्त करने के पश्चात्
मनादेश (मन+आदेश– अ+आ=आ=मनादेश– दीर्घस्वर सन्धि) पाकर जगजीत सिंह जी-द्वारा गायी गयी ग़ज़ल “ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो; भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी। मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन; वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी” जीवन्त हो उठी और वातावरण मे बचपन का अबोध सौन्दर्यबोध घुलता रहा, तब तक, जब तक कि ‘छपाछप’ कर्णरन्ध्रों (कान के छिद्र) मे प्रवेश करता रहा।
लगभग ३० मिनट तक बरखारानी की उछलकूद चलती रही; अकस्मात् परिदृश्य वर्षा-सहित से परे पूर्ववत् स्थिति को प्राप्त कर चुका था। अब ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो (उत्प्रेक्षा अलंकार) वर्षा का आगमन हुआ ही न हो और प्रत्यागमन एक क्षणिक अनुभूति रहा हो। (यहाँ ‘अनुभूति रही हो’ अशुद्ध है; क्योंकि ‘प्रत्यागमन’ पुंल्लिंग-शब्द है, जिसके अनुसार ‘क्रिया’ का निर्धारण हुआ है।)
प्रतीक्षा है, दीर्घकालीन रसधार बूँदों की।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ मई, २०२२ ईसवी।)