आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कितना अनर्थ सिद्ध होता है,
वर्ज्य लक्ष्मण-रेखा का
सीता की भाँति
उल्लंघन करने का परिणाम!
किसी दुरात्मन् रावण के हाथों अपहृत हो
वर्जना के वृत्त में प्रवासी जीवन-यापन का अभ्यास!
कितनी मर्माहत करती है
किसी प्रत्याशित राम की
तीव्र बाट जोहने की प्रतीक्षा!
कितना गहन विषय बन जाता है
राघवेन्द्र और लंकेश में
भेद ढूँढ़ने का अभिलाष? (शुद्ध शब्द ‘अभिलाष’ है, ‘अभिलाषा’ नहीं)
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ जून, २०२२ ईसवी।)